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Monday, 7 December 2015

Think About India

 
किसानी या खेती की समस्या सिर्फ किसानों कि समस्या नहीं है. यह पूरे समाज की समस्या है, क्योंकि खेत में जो भी पैदा होता है, वह हमारे फूड चेन में शामिल है. जो खेत से सफर भले ही शुरू करें, लेकिन मंजिल हमारी किचन ही होती है. इसलिए यदि कोई यह सोचता है कि वह इस सब से अलग है तो गलत है. खेती किसानी सिर्फ गांव देहात या खेत खलिहान की बात नहीं है, यह बात है आपकी हमारी और हम सभी के किचन की.
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किचन कि समस्या सब की समस्या है, अतः यह प्रमुख समस्या है मानवता और जीवन की.....

Sunday, 7 June 2015

प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार हैं किसान

Think About India
आज देश में जो स्थिति बनी है वह किसी से छिपी नहीं है. देश में किसानों का बुरा हाल है. उनकी फसल पहले खेत में बेमौसमी बारिस की शिकार हुई बाद में मंडी में खुले में रखने के कारण और खरीद न होने से फिर से आई बारिश ने उन्हें तबाह कर दिया. आज भी किसान मंडी में जुटे हुए है पर रोज नए-नए बहाने उनके सामने रख दिए जा रहे हैं. किसान नेता उन्हें हड़ताल पर बुला रहे हैं पर किसान को समझ में नहीं आ रहा है की वह हड़ताल करें या आपने अनाज की फ़िक्र. खरीददारी न होने से उन्हें रोज-रोज मंडी के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. उन किसानों का हाल भी पूछने वाला कोई नहीं है जिन्होंने बंटाई पर, किराये के खेत पर खेती की थी. फ़सल उनकी ख़राब हुई है और मुआवजा भी उन्हें नहीं मिल रहा है. सरकार आश्वासन दे रही है और प्रशासन उनकी बातों पर गौर ही नहीं कर रही है. लेखपाल मौके का मुआयना किये बिना ही गिरावदारी की रिपोर्ट बना दे रहे हैं और लोगों को सौ-सौ, दो-दो सौ के चेक वितरित किये जा रहे हैं. यह घटना जले पर नमक छिड़कने से कम नहीं है.

हैरान, परेशान और खस्ता हाल किसान जहाँ पिछला बैंक लोन चुकाने की स्थिति में नहीं है उसपर भी उसे कुछ महीनों की मौहलत दी गयी है. बैंक बिना पिछला लोन चुकाए ऋण देने को तैयार नहीं है और सूद साहूकार मौके का फायदा उठाने के लिए तैयार बैठे हैं. किसान भी कहीं और से पैसा नहीं मिलते देख कर झक मारकर साहूकार के चंगुल में फ़सने के लिए मजबूर है. आज विकट स्थिति में जन-धन योजना का खाता खुलवाने का भी उसे कोई लाभ नहीं पहुँच रहा है.
भारी बारिश का सबसे बुरा असर उन गन्ना किसानों पर सबसे ज्यादा पड़ा है जिन्होंने इस साल गन्ना के साथ-साथ गेहूं की फसल बोई थी. चीनी मिलों ने गन्ने का पैसा नहीं दिया और जो गेहूं की फसल थी वो बुरी तरह खराब हो चुकी है. उन पर लाखों का कर्ज हो चूका है. उन पर दबाव बढ़ता जा रहा है. किसान कहते हैं बैंक वाले आते हैं, कर्ज़ मांगते हैं, उन्हें कर्ज़ नहीं वापस करेंगे तो ज़मीन वापस चली जाएगी. इसीलिए कई लोगों से मनमाने ब्याज के बाद भी पैसा उठाना पड़ता है.

ऐसी विषम परिस्थिति में भी सरकार कहती फिरती है कि कोई भी किसान फसल बर्बादी के कारण आत्महत्या नहीं करता क्योंकि किसान कमजोर नहीं होता. कोई उन्हें बता दो की किसान भी इसी मिट्टी में पले-बढ़े हैं उनकी भी सहनशक्ति होती है और जिसदिन वो जबाब दे जाती है वह भी हार मान लेते हैं. और आत्महत्या का दौर वही से शुरू हो जाता है.

ऐसा कहने वालों को चाहिए वह किसानों की फिक्र करें क्योंकि वो जो रोटी खाते हैं वह इन्ही किसानों की मेहरबानी से मिलती. वह जब बिसलेरी की बोतल का पानी पीते हुए एअरकंडीशन कमरों में बैठ कर  ऐसी बकवास भरी बाते करते हैं तब किसान खेतों में खुले आसमान के नीचे जेठ की दुपहरिया में काम कर रहा होता है. यह भी सच है की किसान को मेहनत कभी नहीं थकाती पर दिन-रात मेहनत कर पाली गई फसल की दुर्दसा उसे थका देती है. उसका कृषि से मोहभंग कर देती है और उसे कारखाने का मजदूर बना देती है.

Wednesday, 28 January 2015

बदलता मौसम और प्रभावित होती खेती



जलवायु परिवर्तन अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लगे लोगों के लिए महज समाचार और खबरे हैं. लेकिन सच यह है की हवा-पानी वाली इस समस्या से देर-सबेरे सबको दो-चार होना ही पड़ेगा. भारत में सूखे और बाढ़ की समस्या को जलवायु परिवर्तन के एक रूप में इसे देखा जा सकता है. जहाँ एक और बाढ़ की स्थिति होती है तो दूसरी तरफ सूखे का मंजर. तापमान और वाष्पीकरण में वृद्धि के कारण सूखाग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है. यह सच है की कृषि से भी जलवायु परिवर्तन पर असर पड़ रहा है तो दूसरी तरफ़  जलवायु परिवर्तन से कृषि भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पा रही.

जाहिर है की कार्बन-डाईऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस-ऑक्साइड, नाईट्रस-ऑक्साइड , सल्फर-डाईऑक्साइड जीवन के लिए आवश्यक हैं पर नियत मात्रा से अधिक हो जाने पर यह समस्या की जड़ बन जाते हैं. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की वातावरण में कार्बन-डाईऑक्साइड की मात्रा औद्योगिक क्रांति से पहले जहाँ 280 पीपीएम थी वही 1990 तक 353 पीपीएम हो गयी. आईपीपीसी के अनुसार हमारे क्रिया-कलापों के कारण प्रतिवर्ष वातावरण में 380 करोड़ टन घुलती है जिसे पेड़-पौधे, समुद्र द्वारा अपनी क्षमता के अनुसार सोखे जाने के बाद भी ½% अतिरिक्त कार्बन-डाईऑक्साइड वातावरण में मौजूद रहती है. मीथेन गैस में जहाँ 0.9% की वृद्धि दर है वहीँ नाईट्रस-ऑक्साइड 0.25% की दर से बढ़ रही है. इसके अतिरिक्त सीएफसी गैस भी स्थान, ऊंचाई और मौसम के अनुसार ग्रीनहाउस प्रभाव को घटाती-बढ़ाती रहती है. इस बढ़ते हुए तापमान या ग्लोबल वार्मिंग से जीवधारी, वृक्ष और मानव जाती सबके लिए खतरा बढ़ता जा रहा है. इससे स्वास्थ्य, आर्थिक, सुरक्षा, खाद्य उत्पादन तथा अन्य समस्याएं बढ़ती जा रही हैं.

एशिया, दक्षिण अफ्रीका, लेटिन अमेरिका जैसे देशों के गरीब किसान बरसात का मौसम बदलने से खेती करने में परेशानी उठा रहे हैं. यह उन्हें और गरीब बना रहा है. बारिश के इस बदलाव के कारण भारत और अफ्रीका के मक्का उत्पादन में करीब 15% की गिरावट देखी जा रही है. देश में फसल उत्पादन के  उतार-चढ़ाव का कारण कम वर्षा, अत्यधिक वर्षा, नमीं, फसलों पर कीड़े लगना आदि प्रमुख हैं.

जलवायु परिवर्तन के कुछ ऐसे भी कारण हैं जो फसलों को सीधे प्रभावित करते हैं-

औसत तापमान में वृद्धि

औद्योगिकी के शुरुवात से लेकर अब तक पृथ्वी के तापमान में करीब 0.8%की वृद्धि हो चुकी है. निश्चित तापमान पर उगने वाली फसलें इससे प्रभावित होती हैं. आज जहाँ आलू, गेंहू, जौ, सरसों की खेती हो रही है तापमान बढ़ने से उसकी खेती ना हो सकेगी. क्योंकि इन फसलों को ठंडक की जरुरत होती है. तामपान वृद्धि से मक्का, धान या ज्वार में कमी हो सकती है क्योंकि इन फसलों में अत्यधिक गर्मी के कारण दाने नहीं बनते या कम बनते हैं. अत्यधिक वर्षा से जहाँ फसलें नष्ट हो जाती हैं वाही हानिकारक कवक बढ़ जाते हैं, मिट्टी की नमी में बदलाव से मृदाक्षरण पर प्रभाव पड़ता है. वर्तमान में कृषि-भूमि से क्षरण के दर 5-7 टन  प्रति हेक्टेयर की बजाय 30 टन टन  प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष  से ज्यादा हो गया है.     

CO2 में वृद्धि से वातावरण में नमी की वृद्धि

CO2 की मात्रा बढ़ने से सूखे और आग के कारण बहुत सी उपयोगी जातियां नष्ट हो जाएँगी तथा उनकी जगह नुकसानदायक जातियां पनपेंगी. तेजी से बढ़ने वाले पेड़ों को कीड़ों से नुकसान पहुचेगा तथा चरागाहों में बढ़िया घास की पैदावार गिर जाएगी. हालाँकि इसके कारण पोधों की बढ़वार में फायदा होगा पर मिट्टी के ख़राब होने से फसल भी अच्छी नहीं होगी.
जहरीली गैसों का प्रभाव

इस समय वायुमंडल में सल्फर ऑक्साइड की 60% की मात्रा और नाइट्रोजन ऑक्साइड की 50% की मात्रा उत्पन्न होती है. वातावरण में नमी के संपर्क में आते ही ये गंधक, अम्ल और नाइट्रिक अम्ल बनातीं हैं जो अम्लीय वर्षा का कारण बनता है और जब इस वर्षा का पानी खेतों में मिलता है तो खेत की सतह को अम्लीय कर देता है जिससे मिट्टी के अंदर बसने वाले सूक्ष्म जिव-जंतुओं, जीवाणुओं, कवकों आदि को अम्ल की विषाक्तता नष्ट कर देती है. धरती की उपरी सतह के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं. मिट्टी की गुणवत्ता घट जाती है और पौधों का विकास बहुत धीरे पड़ जाता है.

ओजोन परत में कमी

सीएफसी गैसों  के कारण ओजोन परत कमजोर होती जा रही है. ओजोन परत के मात्र 1% छीजन से पराबैंगनी किरणों में 2% का इजाफा और उसी अनुपात में खाद्य और जीवन पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ता है.

जाहिर है की जलवायु में होने वाले बदलाव प्रत्यक्ष रूप से खेती को और अप्रत्यक्ष रूप से किसान की आर्थिक स्थिति, उत्पादन व उत्पादकता पर प्रभाव डालती है. इस लिए इस पर गंभीर रूप से विचार किया जाना चाहिए. 

किसान अपनी दिनचर्या बदल कर जलवायु परिवर्तन को कम कर सकते हैं. पेड़ों का संरक्षरण, खाना पकाने और प्रकाश  के लिए  के लिए गोबर-गैस का इस्तेमाल, रासायनिक उर्वरकों और छिडकाव  के स्थान पर जैविक खाद और नीम मिश्रित छिडकाव, वर्षा के पानी का संचय, वाहनों का कम-से-कम प्रयोग और अधिक-से-अधिक पेड़ लगाकर अपना सहयोग दे सकते हैं और अपनी खेती और खेती से होने वाले उत्पादन को बनाये रख सकते हैं.

Wednesday, 24 December 2014

आया सैंटा आया, खुशियों के तोहफे लाया


क्रिसमस वैसे तो ईसाई धर्म के अनुयायियों का सबसे बड़ा त्योहार है लेकिन धीरे धीरे अब अन्य धर्मों के लोगों ने भी इसे अपना लिया और अब इसे धूमधाम से मौज-मस्ती के त्यौहार के रूप में मनाने लगे हैं. क्रिसमस आते ही जहाँ एक तरफ बाजारों में दिवाली जैसी रौनक नजर आने लगाती है तो दूसरी तरफ कान्वेंट स्कूलों में इस पर्व पर विभिन्न तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेले आयोजित किये जाने लगते हैं. इस त्यौहार के सर्वव्यापी बनने का सबसे बड़ा कारण शायद सांता क्लाज़ रहा है, जिसने दुनियाभर के बच्चों का मन मोह लिया और हर धर्म के लोगों को क्रिसमस मनाने के लिए प्रेरित किया. 
बच्चे टीवी और विज्ञापन देख कर हमसे पूंछते थे क्या हमारे घर भी सांता आयेगा तो हम भी हा कह दिया करते थे और 24 की रात में जब बच्चे एक पत्र लिखकर अपने जुराब खिड़की से लटका देते थे तो हम भी उनकी बालपन को देखकर उनके जुराबों में गिफ्ट डाल दिया करते थे. आज बच्चे बड़े हो गए हैं और वह हकीकत को जानते हैं पर वह भी अपने बच्चों के लिए हमारे जैसा ही करने लगे हैं. अब तो वह क्रिसमस ट्री और केक भी काटने लगे हैं. इसी तरह शायद हर गैर इसाई घर में क्रिसमस की परंपरा चल रही है.  
क्रिसमस
क्रिसमस शब्‍द का जन्‍म क्राईस्‍टेस माइसे अथवा ‘क्राइस्‍टस् मास’ शब्‍द से हुआ है. ऐसा अनुमान है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई. में मनाया गया था. यह प्रभु के पुत्र जीसस क्राइस्‍ट के जन्‍म दिन को याद करने के लिए पूरे विश्‍व में 25 दिसम्‍बर को मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव क्रिसमसटाइड की भी शुरुआत होती है. ब्रिटेन और अन्य राष्ट्रमंडल देशों में क्रिसमस से अगला दिन यानि 26 दिसम्बर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है. कुछ कैथोलिक देशों में इसे सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहते हैं.


क्राइस्‍ट के जन्‍म के संबंध में नए टेस्‍टामेंट में बताया गया है कि प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा. गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्‍म देगी तथा बच्‍चे का नाम जीसस रखा जाएगा. व‍ह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्‍य की कोई सीमाएं नहीं होंगी. बाद में मैरी का विवाह जोसफ से हो गया और देवदूत गैब्रियल ने जोसफ को बताया वह मैरी की देखभाल करे व उसका परित्‍याग न करे. जिस रात को जीसस का जन्‍म हुआ, उस समय लागू नियमों के अनुसार अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ बेथलेहेम जाने के लिए रास्‍ते में थे रात में कही जगह ना मिलने पर उन्‍होंने एक अस्‍तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्‍म दिया तथा उसे एक नांद में लिटा दिया. इस प्रकार प्रभु के पुत्र जीसस का जन्‍म हुआ.

व्हाइट क्रिसमस
क्रिसमस पर ताजा बर्फबारी के पड़ने को हमेशा से ही शुभ माना जाता रहा है. ब्रिटिश शासनकाल के दौरान शिमला में बर्फ के बीच मनाई जाने वाली व्हाइट क्रिसमस के किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. यही वजह है कि व्हाइट क्रिसमस का क्रेज आज भी लोगों में बरकरार है. 22 साल पहले शिमला में क्रिसमस पर ताजा बर्फ पड़ी थी. हालांकि मौसम विभाग ने 25 दिसंबर को मौसम के शुष्क रहने की भविष्यवाणी की है, लेकिन पर्यटकों और स्थानीय लोगों को को दिसंबर के दूसरे हफ्ते में ही शिमला और इसके आसपास अच्छी खासी बर्फबारी से यह उम्मीद बंधी है कि शायद इस दफा कुदरत मेहरबान हो जाए और लम्बे अरसे बाद उन्हें व्हाइट क्रिसमस मनाने का मौका मिल जाए.

कैसे मनाया जाता है
क्रिसमस की पूर्व संध्या पर लोग प्रभु की प्रशंसा में कैरोल गाते हैं क्रिसमस के दिन विश्व भर के गिरजाघरों में प्रभु यीशु की जन्मगाथा की झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं और गिरजाघरों में प्रार्थना की जाती है. लोग प्यार व भाईचारे का संदेश देने एक दूसरे के घर जाते हैं दावत करते हैं और एक-दुसरे को शुभकामनाएं व उपहार देते हैं. क्रिसमस का विशेष व्यंजन केक है, केक बिना क्रिसमस अधूरा होता है. बच्‍चे सुंदर रंगीन वस्‍त्र पहने ड्रम्‍स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्‍ट्रा के साथ चमकीली छडियां लिए हुए सामूहिक नृत्‍य करते हैं.


क्रिसमस ट्री
क्रिसमस ट्री अपने वैभव के लिए पूरे विश्‍व में लोकप्रिय है. लोग अपने घरों को पेड़ों से सजाते हैं तथा हर कोने में मिसलटों को टांगते हैं. सदाबहार क्रिसमस वृक्ष डगलस, बालसम या फर का पौधा होता है जिसे रंगबिरंगी रोशनियों, सितारों, घंटियों, उपहारों, चॉकलेट्स से सजाया जाता है. घर के अंदर क्रिसमस ट्री सजाने की परंपरा की शुरूआत मार्टिन लूथर ने की थी और उन्होंने क्रिसमस ट्री के तीन पॉइंट को परमेश्वर के त्रियेक रूप पिता़, पुत्र और पवित्र आत्मा माना था.
सेंटा क्लॉज
सेंट बेनेडिक्टी उर्फ सान्ता क्लॉज़, लाल रंग व सफेद रंग ड्रेस पहने हुए, एक वृद्ध मोटा पौराणिक चरित्र है जिसके द्वारा क्रिसमस की रात बच्चों के लिए उपहार लाने की मान्यता है. ऐसी मान्यता है कि सेंटा क्लॉज रेंडियर पर चढ़कर किसी बर्फीले जगह से आते हैं और चिमनियों के रास्ते घरों में प्रवेश करके सभी अच्छे बच्चों के लिए उनके सिरहाने उपहार छोड़ जाते हैं. 
सेंटा क्लॉज की प्रथा संत निकोलस ने चौथी या पांचवी सदी में शुरू की थी. वे एशिया माइनर के बिशप थे और उन्हें बच्चों और नाविकों से बेहद प्यार था. उनका उद्देश्य था कि क्रिसमस और नववर्ष के दिन गरीब-अमीर सभी प्रसन्न रहें.
भारत में प्रसिद्ध चर्च
भारत में गोवा, पच्छिम बंगाल और केरल राज्य में क्रिसमस की काफी धूम रहती है इसके अलावा विभिन्न शहरों की बड़ी चर्चों में भी इस दिन सभी धर्मों के लोग एकत्रित होकर प्रभु यीशु का ध्यान करते हैं. भारत के अधिकांश चर्च ब्रि‍टिश व पुर्तगाली शासन के दौरान स्‍‍थापित किए गए थे. भारत के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ कैथेड्रिल, और आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च आफ सेंट फ्रांसिस आफ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जांस चर्च इन विल्डंरनेस और हिमाचल में क्राइस्ट  चर्च, सांता क्लांज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्टे चर्च तथा माउन्टच मेरी चर्च महाराष्ट्रा में, तमिलनाडु में क्राइस्टच द किंग चर्च व वेलान्क न्नीक चर्च, और आल सेंट्स चर्च व कानपुर मेमोरियल चर्च उत्तेर प्रदेश आदि हैं जहाँ क्रिसमस में काफी चहल-पहल रहती है.
बड़ा दिन
भारत और इसके पड़ोसी देशों मे इसे बड़ा दिन यानि महत्वपूर्ण दिन कहा जाता है. किसी देश पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये सबसे अच्छा तरीका है कि वहां की संस्कृति, सभ्यता, धर्म पर अपनी संस्कृति, सभ्यता और धर्म को कायम करो. 210 साल पहले, अंग्रेजों ने भारत में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी. यह वह समय था जब ईसाई धर्म फैलाने की जरूरत थी. उस समय 25 दिसम्बर वह दिन था, जबसे दिन बड़े होने लगते थे. हिन्दुवों में इसके महत्व को भी नहीं नकारा जा सकता था. शायद इसी लिये इसे बड़ा दिन कहा जाने लगा ताकि हिन्दू इसे आसानी से स्वीकार कर लें.


क्रिसमस का महत्त्व
हर त्यौहार का कोई-न-कोई महत्त्व अवश्य होता है वैसे ही क्रिसमस विश्व बंधुत्व और शांति का त्यौहार है. इस त्यौहार का मूल मकसद गरीबों और असहायों की सेवा करना है. सैंटा इसी बात का प्रतीक है. अब एक सांता क्लॉज ढेर सारे उपहार लेकर एक ही रात में दुनिया भर के सभी घरों में तो नहीं पहुँच सकता इसीलिए समाज के सभी छुपे सैंटा को इस दिन बिना किसी स्वार्थ के बाहर आ कर गरीबों की मदद करनी चाहिए और उनके बीच खुशियाँ बाटनी चाहिए. अगर हम किसी एक गरीब, अशहाय, लाचार के  चेहरे पर ख़ुशी ला सके तो हम इस क्रिसमस को सही मायने में मनाने में कामयाब हो सकेंगे. इस काम को करने के लिए आपको अपनी आमदनी और अधिक समय व्यर्थ करने की जरूरत नहीं है आप यह काम अपने घर के अगल-बगल से शुरू कर सकते हैं. आप के घर में अगर कुछ पुराने कपड़े हैं जिन्हे आप इस्तेमाल नही कर रहे हैं, आप उसे किसी मंदिर या गुरूद्वारे में दे सकते हैं ताकि वो किसी गरीब के तन ढकने के काम आ सके और कम से कम इन सर्दियों को बिना किसी तकलीफ के गुजार पांए.
अगर आप के घर में छोटे बच्चे हैं तो आप उन्हे भी सिखांए कि वो अपने पुराने खिलौनों को आपके घर में काम करने वाले गरीब जरूरतमंद को दे दें. अगर आप क्रिसमस देने के लिए उपहार खरीदने का सोच रहे हैं तो आप किसी अनाथ आश्रम या संस्था में बच्चों के हाथ से बने हुए उपहार खरीदें. शायद इस तरह आप इस साल एक नई तरीके से शुरूआत कर सकेंगे, और यकीन मानिए आप तब अगले क्रिसमस का और जोश और उल्लास के साथ स्वागत करेंगे.

Tuesday, 23 December 2014

हींग लगे ना फिटकरी फिर भी रंग चोखा होय


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अधिक उत्पादन पाने के लिए किसानों ने अन्धाधुन्ध रासायनिक उर्वरक, हानिकारक कीटनाशक, हाइब्रिड  बीज और  अधिकाधिक भूजल उपयोग किया जिससे भूमि की उर्वरक शक्ति, उत्पादन भूजल स्तर और मानव स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट आयी है. किसान भी खेती पर लगातार बढ़ते जाने वाले खर्च एवं कम लाभ पाने की स्थिति से तंग आकर खेती छोड़ने के लिए मजबूर हो गए. कईयों ने स्थिति से तंग आकर आत्महत्या तक कर ली. जैविक खेती (बर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट बायोडायनामिक) भी जटिल होने के कारण अन्ततः किसान को बाजार पर ही निर्भर बना रही है. अतः आवश्यकता ऐसी कृषि पद्धति की है जो खर्चीली ना हो परन्तु  उत्पादन,  खेत के उपजाऊपन पर कोई प्रभाव न पड़े साथ ही मानव स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहे. ऐसी ही कृषि पद्धति है ‘जीरो बजट प्राकृतिक खेती’ जिसमें 1 देशी गाय से 10-30 एकड़ खेती सम्भव है.
जीरो बजट कैसे
मुख्य फसल का लागत मूल्य साथ में उत्पादित सह फसलों के विक्रय से निकाल लेना और मुख्य फसल को बोनस (शून्य लागत) के रुप में लेना.खेती के लिये सभी संसाधन (बीज, खाद, कीटनाशक आदि) निर्माण अपने घर या खेत में करके उत्पादन लागत जीरो मूल्य पर करना. 
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जीरो लागत खेती का आधार
 प्रकृति में सभी जीव एवं वनस्पति इकाईयों के भोजन की एक स्वालम्बी व्यवस्था है जिसमें मानव की भूमिका नहीं है जिसका प्रमाण है बिना किसी मानवीय सहायता के जंगलों में खड़े हरे भरे पेड़ व उनके साथ रहने वाले लाखों जीव जन्तु इस प्राकृतिक व्यवस्था को समझना व उसके अनुरुप खेती करना.
क्या है प्राकृतिक व्यवस्था
पौधों के पोषण के लिये आवश्यक सभी 16 तत्व प्रकृति में उपलब्ध हैं  उन्हें पौधे के भोजन रुप में बदलने का कार्य मिट्टी में पाये जाने वाले करोड़ो सूक्ष्म जीवाणु करते हैं. यदि यह सूक्ष्म जीवाणु पर्याप्त संख्या में मिट्टी में उपलब्ध रहें तो अन्य किसी तत्व की जरुरत नहीं होगी. इस पद्धति में पौधों पर जोर ना देकर सूक्ष्म जीवाणु की उपलब्धता पर जोर दिया जाता है. प्रकृति में इस सूक्ष्म जीवाणु की भी उपलब्धता एक विशिष्ट व्यवस्था है.
पौधों अपना पोषण प्रकृति की चक्रीय व्यवस्था से प्राप्त कर लेते हैं. पौधा पोषण के लिये आवश्यक तत्व मिट्टी से लेता है. फसल पकने के बाद काष्ठ प्रदार्थ (कूड़ करकट) के रुप में मिट्टी में मिलकर, अपघटित होकर मिट्टी में मिल जाते है और उसकी उर्वरा शक्ति को बढ़ा देते हैं.

देशी गाय का महत्व
एक ग्राम देशी गाय के गोबर में 300-500 करोड़ सूक्ष्म जीवाणु पाये जाते हैं. गाय के गोबर में गुड़ एवं अन्य प्रदार्थ डालकर किण्वन से सूक्ष्म जीवाणु बढ़ाने की क्रिया तेज कराके तैयार जीवामृत/घनजीवामृत जब खेत में पड़ता है तो करोड़ो सूक्ष्म जीवाणु भूमि में पौधो का भोजन निर्माण करते हैं एवं किसी बाहरी पदार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती.
देशी केचुओं का महत्व
केचुआ मिट्टी बालू पत्थर (कच्चा व चूना) खाता हुआ धरती के नीचे 15 फुट गहराई तक भूमि के नीचे चला जाता है. जिससे धरती के नीचे के पोषक तत्वों ऊपर आ जाते हैं. केंचुए पौधों की जड़ के पास धरती के ऊपर अपनी विष्टा छोड़ता है जिसमें फसल के लिये सभी आवश्यक तत्वों का भण्डार होता है. केंचुआ जिस छेद से नीचे जाता है कभी उससे ऊपर नहीं आता है. वह भूमि में दिन रात करोड़ो छिद्र कर भूमि की जुताई करता रहता है. जिससे भूमि मुलायम बनती है एवं जब बारिश होती है तो इन्हीं छिद्रों से पूरा वर्षा जल भूमि में संग्रहित होता है. इन्ही छिद्रों से पोधों तक हवा का प्रवाह भी बना रहता है.
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जीरो लागत प्राकृतिक कृषि के चरण
बीजामृत (बीज शोधन) : 5 किलो देशी गाय का गोबर, 5 ली0 गोमूत्र, 50 ग्राम चूना, एक मुट्ठी खेत की मिट्टी 20 ली0 पानी में मिलाकर 24 घंटे रखे. दिन में दो बार लकड़ी से घोले. तैयार बीजामृत को 100 किलो बीजों पर उपचार करें. छांव में सुखाये एवं बोयें.
जीवामृत : जीवामृत सूक्ष्म जीवाणु का महासागर है जो पेड़ पौधों के लिए कच्चे पोषक तत्वों को पकाकर पौधों के लिये भोजन तैयार करते हैं. गौमूत्र 5-10 लीटर, गोबर 10 किलो, गुड़ 1-2 किलो, दलहन आटा 1-2 किलो, एक मुट्ठी जीवाणुयुक्त मिट्टी (100 ग्राम), पानी 200 लीटर, इन सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर, ड्रम में जूट की बोरी से ढककर छाया में रखें। सुबह व शाम डंडे से घड़ी की सुई की दिशा में घोलें. 48 घंटे बाद छानकर इसका इस्तेमाल नीचे दी गयी विधिनुसार सात दिन के अन्दर करें.
सिंचाई पानी के साथ : 1 एकड़ में 200 लीटर जीवामृत सिंचाई करते समय पानी के साथ टपक विधि से या धीमे-धीमे बहा दें.
छिड़काव द्वारा : पहला छिड़काव बुवाई के 1 माह बाद 1 एकड़ में 100 लीटर पानी 5 लीटर जीवामृत मिलाकर करें. दूसरा छिड़काव 21 दिन बाद 1 एकड़ में 150 लीटर पानी व 10 लीटर जीवामृत मिलाकर करें. तीसरा व चौथा छिड़काव 21-21 दिन बाद 1 एकड़ में 200 लीटर पानी व 20 लीटर जीवामृत मिलाकर करें. आखिरी छिड़काव दाने की दूध की अवस्था में प्रति एकड़ में 200 लीटर पानी, 5-10 लीटर खट्टी छाछ (मट्ठा) मिलाकर छिड़काव करें.
घन जीवनामृत : घन जीवनामृत जीवाणुयुक्त सुखा खाद है जिसे बुवाई के समय या पानी के तीन दिन बाद भी दे सकते हैं. गोबर 100 किलो, गुड़ 1 किलो, आटा दलहन 1 किलो, मिट्टी जीवाणुयुक्त 100 ग्राम उपर्युक्त सामग्री में इतना गौमूत्र (लगभग 5 ली0) मिलायें जिससे हलवा/पेस्ट जैसा बन जाये, इसे 48 घंटे छाया में बोरी से ढककर रखें. इसके बाद छाया में ही फैलाकर सुखा लें, बारीक करके बोरी में भरे. इसका 6 माह तक प्रयोग कर सकते हैं. 1 एकड़ में 1 कुन्तल तैयार घन जीवामृत देना चाहिए.
अच्छादन : देशी केंचुओं एवं सूक्ष्म जीवाणुओं के कार्य करने के लिये आवश्यक ‘‘सूक्ष्म पर्यावरण’’ उपलब्ध कराने हेतु एवं भूमि की नमी को सुरक्षित करने हेतु भूमि को ढंकना (आच्छादन) पड़ता है. सूक्ष्म पर्यावरण का आशय है पौधों के बीच हवा का तापमान 25-32 डिग्री, नमी 65-72 प्रतिशत व भूमि सतह पर अंधेरा. जब हम भूमि का काष्ठ प्रदार्थो से या अन्य प्रकार से आच्छादन करते है तो सूक्ष्म पर्यावरण का निर्माण होता है जिसमें देशी केंचुओं व सूक्ष्म जीवाणु को उपयुक्त वातावरण मिलता है एवं भूमि की नमी का वाष्पन नहीं हो पाता. बाद में काष्ठाच्छादन भूमि में अपघठित होकर उर्वरा शक्ति का निर्माण करता है.
    सह फसलों द्वारा भी भूमि को सजीव आच्छादन के द्वारा ढका जा सकता है.
बेड व नाली व्यवस्था द्वारा जल की बचत : पौधों की जड़े पानी को सीधे नहीं लेती बल्कि मिट्टी कणों के बीच 50 प्रतिशत हवा व 50 प्रतिशत वाष्प के मिश्रण (वाफसा) को लेती हैं. अतः सतह से ऊचे तैयार बेड पर फसलो को नालीयों द्वारा पौधों की आवश्यक सिंचाई वाफसा के रुप में उपलब्ध कराने से पानी की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है. नालीयों को भी आच्छादन से ढक दिया जाता है.
बहुफसली पद्धति : उचित मिश्रित फसलों को लेने पर फसलों की जड़े अलग-अलग स्तर से उचित खुराक ले लेती हैं एवं सहअस्तित्व के आधार पर रोगों एवं कीटों से बचाव तथा नाइट्रोजन का बटवारा कर लेती है। उचित फसल चक्र अपनाने से भूमि को नाइट्रोजन स्वतः ही प्राप्त हो जायेगा। ऊपर से यूरिया देने की आवश्यकता नहीं होगी।
फसल सुरक्षा: इस पद्धति में कीट नियंत्रको की आवश्यकता ही नहीं पड़ती क्योंकि कीट आते ही नहीं फिर भी आवश्यकता पड़ने पर गोबर गौमूत्र, छाछ एवं वनस्पतियों द्वारा तैयार नीमास्त्र, ब्रहमास्त्र, अग्नियास्त्र, फफूदनाशक, दशपर्णी अर्क आदि बनायी जाती है.
ध्यान देने योग्य बातें:
प्राकृतिक कृषि में देशी बीज ही प्रयोग करें.
प्राकृतिक कृषि में किसी भी भारतीय नस्ल का देशी गोवंश ही प्रयोग करें. जर्सी या होलस्टीन का प्रयोग हानिकारक है.
जीवाणुयुक्त मिट्टी हेतु बट वृक्ष पीपल के नीचे या मेंढ़ की मिट्टी लें.
पेड़ पौधों व फसल की पंक्ति की दिशा उत्तर दक्षिण होगी.
दलहन फसलों की सह फसली खेती करना अच्छा रहता है.
किसान भाइयों भारतवर्ष में खेतीक्षेत्र कम पानी, असामयिक बरसात और सूखे वाला क्षेत्र है इसमें रासायनिक खेती और महंगी होती जाएगी तथा पैदावार (उत्पादन) घटता जाएगा इसमें पूरी फसल समाप्त होने के खतरे ज्यादा है. रासायनिक खेती में रोग स्वयं लगते हैं इसे जीरों बजट/प्राकृतिक खेती से बचाया जा सकता है.


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