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Wednesday, 16 March 2016

असहिष्णुता

Think About India

'असहिष्णुता' का उच्चारण कठिन कृत्य है
उससे भी पेचीदा है सहज मतलब समझना
कम लोगों के शब्दकोश में था इसके पूर्व
पर जरुरत-मार्केटिंग के तहत खूब रगड़ाया
पहले धूल झाडी गयी, फिर फटकारा गया
थोड़ा चमका तो कबाड़े को नवा कर बेचा गया
उन-उन को जिनके माथे एक शब्द दिखा
लोग शराब पीते हुए, लश्कर में चलते हुए
आतंकित थे, काँप रहे थे, चिंता में थे
तब किसान दूर खेत में फसल काट रहा था
जुलाहा कपडे बुन रहा था, माँ रोटी सेंक रही थी
बहन भाई को थपथपा के सुला रही थी
प्रेमिका प्रेमी के आलिंगन में विश्वस्त थी
चंद सिरफिरों को चिंता थी असहिष्णुता की
जो वास्तव में उनके दिमाग का महज फितूर था...

Monday, 7 December 2015

Think About India

 
किसानी या खेती की समस्या सिर्फ किसानों कि समस्या नहीं है. यह पूरे समाज की समस्या है, क्योंकि खेत में जो भी पैदा होता है, वह हमारे फूड चेन में शामिल है. जो खेत से सफर भले ही शुरू करें, लेकिन मंजिल हमारी किचन ही होती है. इसलिए यदि कोई यह सोचता है कि वह इस सब से अलग है तो गलत है. खेती किसानी सिर्फ गांव देहात या खेत खलिहान की बात नहीं है, यह बात है आपकी हमारी और हम सभी के किचन की.
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किचन कि समस्या सब की समस्या है, अतः यह प्रमुख समस्या है मानवता और जीवन की.....

Thursday, 3 September 2015

बैंडस्टैंड का बुढ़ा बरगद

Think About India



भारत में बरगद प्राचीन काल से एक महत्त्वपूर्ण वृक्ष माना गया है. वेदों से लेकर काव्य रचनाओं में भी इसका उल्लेख आता है. बरगद को लेकर अनेक धार्मिक विश्वास और किंवदंतियाँ प्रचलित हैं. 'वट सावित्री' की पूजा इसका प्रमाण है. बरगद के पेड़ की छाल में विष्णु, जड़ में ब्रम्हा और शाखाओं में शिव का वास मानते हैं. इसीलिए इसे काटना पाप समझा जाता है. वामन पुराण  में यक्षों  के राजा 'मणिभद्र' से वट वृक्ष उत्पन्न होने का उल्लेख है-

यक्षाणामधिस्यापि मणिभद्रस्य नारद।
   वटवृक्ष: समभव तस्मिस्तस्य रति: सदा।।

कहते हैं बरगद-पीपल खुद लगते हैं ये दोनों पौधे लगाए बीज से पल्लवित नहीं होते बल्कि पक्षी-बीट से ही यत्र-तत्र खंडहर या पुरानी इमारत में अपने आप पनप जाते हैं. पर  गाँव से बाहर सड़क किनारे का बरगद कैसे पनपा कोई नहीं जानता. चिरपरिचित बुढ़ा बरगद आज भी वैसा  ही खड़ा है जैसा हमारे छुटपन में खड़ा था. पूंछने पर दादा-बाबा भी अपनी स्मृति पर जोर डालते हुए कहते थे-‘जब से देख रहे हैं, यह ऐसे ही खड़ा है.’ खूब साथ दिया है उसने उनका और हमारा. यह पुरुखों के बाद हमारे साथ भी बढ़ता रहा और गर्मी-जाड़ा-बरसात, सभी मौसम सहता, अपनी भुजाएं फ़ैलाता, जड़ों को मिट्टी में फैलाता और जकड़ता, शाखाओं को बरोह-स्तंभों के सहारे टिकाता बढ़ता रहा और इतना विशालकाय हो गया है की पूरा गाँव उसकी छाँव में आ जाय. मुझे तो  आज भी उसकी विस्तारवादी मानसिकता कुंद  हुई नहीं लगती, अभी और भी विस्तार उसमें शेष नज़र आता है. पर यह विस्तार-छाँव शासक का नहीं, अपितु आसान जमाए साधू का है, धीर-गंभीर बुजुर्ग का है. जिसके तले बैठ कर शांति मिलती है क्रोध जाता रहता है, हम जैसों को सीख मिलती है.

खुले एवं सूखे स्थान पर होने के कारण इसके तने मोटे होकर जमींन के अन्दर से प्राण शक्ति खिंच रहे हैं. तने ऊपर उठकर अनेक शाखाओं और उपशाखाओं में विभक्त हो कर चारों ओर फैल कर हमारे खुद के विकास को दर्शाने लगा है. इसकी आयु की गणना का स्वतः अनुमान उसके तने और शाखाओं की मोटाई एवं स्वरूप पर दिखता है. अन्य छोटे और नये बरगद के वृक्ष के तने जहाँ गोल और शाखाएँ बच्चों की त्वचा की तरह चिकनी होती है, वहीँ इस बूढ़े बरगद के तने और शाखाएँ खुरदरी, पपड़ी वाली हो गईं हैं, जैसे बुजुर्गों की झुर्रियां हों. और तने लम्बे, चौड़े घेरे गोल न होकर अनेक तारों जैसी जटाओं का समूह सा जनाई पड़ते हैं. इसे देख कर स्कन्दपुराण  का प्रसंग स्वतः स्मरण हो जाता है-‘ अश्वत्थरूपी विष्णु: स्याद्वरूपी शिवो यत:’- अर्थात् पीपलरूपी विष्णु व जटारूपी शिव हैं. उसकी विशालता देखकर हरिवंश पुराण के प्रसंग- 

न्यग्रोधर्वताग्रामं भाण्डीरंनाम नामत:।
दृष्ट्वा तत्र मतिं चक्रे निवासाय तत: प्रभु:।।
भंडीरवट की भव्यता से मुग्ध हो स्वयं भगवान ने उसकी छाया में विश्राम किया- की याद आ जाती है.  
आज भी जब उसे देखता हूँ तो लगता हैं की क्या मनुष्य इतना सुदृढ़ हो सकता है जितना यह बूढा बरगद है. उसने ताउम्र कितना-कुछ वहन नहीं किया है. कभी वह खुद में ही पूरा मोहल्ला बन बैठा था. उसकी जड़ से लेकर आकाश छूती शाखाओं पर अनेकों पंछी, सांप, चूहे, बंदर, चमगादड़, कीड़े-मकोड़े और न जाने किन-किन जीवों ने साधिकार बसेरा बसा रखा था. एक किनारे भैंस-गाय बंधती हैं तो मुख्य चबूतरे पर पूजा होती है, मन्नते मंगती है, चौपाल, पंचायत चलती है. पेड़ के बीच छाव में गाँव की राजनीति चलती थी. अन्य किनारे पर बूढ़े-बुजुर्ग झपकी पाते थे और बच्चे लटके बरोह से झूल,पेड़ पर चढ़ ‘टारजन’ बनते थे. पथिक भी इतनी लम्बी-चौड़ी छाँव का लोभ कैसे त्याग सकता है और बरबस खिंच चला आता था और कुएं का पानी और शीतल छाँव में अपनी थकान मिटाता था. दुकाने भी गुमटियों,ठेले-खोमचे में चल निकली थी साथ ही नाऊ, सायकिल बनाने की दूकान भी चल रही थी.
इसकी बूढ़ी पर जवान आँखों ने क्या कुछ नहीं देखा? कहते हैं इसके नीचे कांग्रेस हो या कामरेड-सभी बड़े नेताओं ने यहाँ अपनी आवाज उठाई थी. अंग्रेजों ने भी यहाँ फ़रमान जारी किए थे. राजा-महाराजा की शानो -शोकत से लेकर आजादी के लिए सर्वश्य न्योछावर करते शक्ले देखी हैं इसने. तो दूसरी तरफ आजादी के बाद के मुरझाए जनता की चिंताओं और नेताओं के शिथिल होते, भ्रष्ट होते, मुखोटा लगाते शक्ले देखी है इसने. इसने तो देशभक्त बेटों के फांसी का वजन भी खुद उठाया है. छटपटाते प्राणों की चीख, गोलियां और गालियाँ सभी को झेला है. यह शांत सा दिखने वाला आकाश प्रभृत वटवृक्ष के  गर्भ में कितने ही राज आज भी दफ्न हैं पर यह सदैव की भांति आज भी मौन है.   
कितनी दम्पत्तियों ने इस बरगद से मनुहार कर अपनी संताने पायी हैं और कितनों स्त्रियों ने  बरगद देवता से 
गुहार अपने
 सुहाग की रक्षा की है- सदियां इस की गवाह हैं. वह कितने कुकर्मियों के दंड का गवाह है, तो कितने गाँव के झगड़ों का पैरोकार भी है-यह बरगद. गाँव के सभी झगड़े चाहे कितने ही पेचीदे क्यों न हों यहीं आकर सुलझ जाते थे. कितने बच्चों के जन्म, मुंडन, कितने युवक-युवतियों के विवाह और कितनी डोलियों से निहारती आँखों का साक्षी है यह बरगद. कितने बच्चों-बच्चियों, बहुओं के नर्म स्पर्श; पुरुषों के कठोर हाथों और बुजुर्गों के काँपते हाथों की पहचान है इसे. कहते हैं जब गाँव सोता था तो बरगद जागता था और गाँव की रखवाली करता था.
आज भी याद है रात में यह कैसे अपना विकराल दानव रूप प्रकट करता था. माँ कहती थी- ‘इसमें ब्रम्ह रहता है.’ चमगादड़ों और उल्लुओं की आवाजें इसे और भी भयानक बना देती थी. आप खुद सोचो जिसकी सघनता को दिन में सूर्य की किरणें न भेद पाती हों उस वृक्ष के नीचे रात का दृश्य क्या होगा. उसपर स्वतंत्रता के समय की कहानियां और वीर नायकों की कुर्बानियों के भूत सदैव जिन्दा रहे. बच्चे दिन में चाहे जितनी धमा-चौकड़ी क्यों न करले पर रात में अकेले भूल कर भी उधर नहीं जाते थे.
बरगद के नीचे लगने वाले मेले को हम कभी भी नहीं भूल सकते. गाँव में गुड़ की जलेबी, गट्टे, मिठाइयाँ, नमकीन, खैनी-सुरती, चूड़ी, टिकुली, हार, कंगन से लेकर झूला, बांसुरी, गुब्बारे,फिरकी, भदेली, कड़ाही सब मिल जाते. आज भी मिठाइयों और नमकीनों के स्वाद जीभ पर पानी ला देता है.
बाबा कहा करते थे की बरगद की नीचे बनियों की चलती दूकान के कारण ही इसे ‘बनियों का पेड़ (बैनियन ट्री)’ पुकारा गया. ‘बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज’ भी बरगद की छाँव में पल्लवित हुआ है. सुना है इंडोनेशिया में बरगद वृक्ष साम्राज्य का बड़ा-बुजुर्ग होने के चलते इस कदर सम्मानीय है की मार्ग में कहीं यह दिख जाय तो वाहन चालक हॉर्न बजाकर आज भी अभिवादन करता है- जैसे हम बुजुर्गों को राम-राम करते हैं. बरगद अपनी विशेषताओं और लंबे जीवन के कारण अक्षयवट बना और इसी कारण इसे भारत का राष्ट्रीय वृक्ष भी करार गया.
स्कूल के मास्टर साहब कहते थे की वट-बीज बनो अन्दर विशाल वृक्ष की संभावनाओं को संजो कर रखो और अनुकूल परिस्थिति होते ही वृहद् विस्तार करो- तब समझ में नहीं आता था की इन शब्दों का तात्पर्य कितना गंभीर है पर अब समझ में आने पर हम खुद जटिल बन गए हैं.
गाँव का बरगद आज भी वैसे ही खड़ा है. पर अब वह भाव नहीं रहा. बरगद के किनारे से पक्की सड़क गुजर गई है. दिन भर वाहनों का रेला लगा रहता है. बड़ी-बड़ी तरह-तरह की पक्की दुकाने खुल गयी हैं. बरगद की मान्यता अब पारमार्थिक ज्यादा हो गयी है आत्मिक कम या यों कहें ख़त्म हो गयी है. कहीं तो कुछ है जो छूट रहा है और दिल को कचोट रहा है. क्योंकि अब बरगद के नीचे गाँव नहीं बसता.
 

Sunday, 7 June 2015

देवभूमि और हमारी फितरत

Think About India


इंसानियत नामक चिड़ियाँ रेड डाटा बुक में लिस्टेड हो गयी है, संवेदना नामक कीड़ा शरीर से उसी तरह गायब हो रहा है जैसे क्रोसिन लेने के बाद शरीर का दर्द, सेवाभाव आउटडेटिड फैशन हो गया है. ‘आपना काम बनता भाड़ में जाय जनता’ जुमला चलन में  है. लाशें कमाई का जरिया बन रही है. आपदा, सुनामी, भूकंप आने पर सम्बंधित स्थान महत्पूर्ण लोगों के लिए पर्यटन स्थल बन जाता है. महत्पूर्ण आदमी नंगे, भूखे-प्यासे, चिलचिलाती धुप से बचते, मौत से जूझते, अपनों को खोजते लोगों के हवाई मार्ग से दरसन कर तात्कालिक स्थिति का संज्ञान लेते हैं. राहत कार्यों में देरी होती है तो हो, राहत कार्य के लिए हेलीकाप्टर और संसाधनों का अभाव रहे फिर भी माननीय हवाई मार्ग से सम्पूर्ण संसाधन के साथ उन्हें तड़फता देख ही आते हैं.

लोगों के लिए नई पर प्रवृत्ति विशेषज्ञों के लिए पुरानी खबर आरटीआई के जरिए मिली है की उतराखंड आपदा-2013 के समय देवभूमि में खूब पिकनिक मनी है, मटन, पनीर और रसगुल्ले उड़े हैं. बेफालतू लोग शोर मचाते है, ब्लडी इंडियन, ब्लैक एंड ब्राउन पीपल ये भी नहीं समझते की अपना काम खुद करना पड़ता है. आपको चोट लगी है तो डॉक्टर ढूढ़ों, आपका पैर जख्मी है तो रेंग के जाओ, आपका बच्चा लापता है तो गुमसुदी दर्ज करवाओं पर व्यर्थ शोर मत मचाओ. आपकी तो भगवान ने नहीं सुनी फिर इन्सान क्या सुनेगा. भगवान ने दंड दिया है तो सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी. इन्सान कौन होता है भगवान और उसके दंड के बीच में आने वाला.
हमारी रूह तो संसारिकता से मुक्त है, वह जानती है की सब माया है, दुःख-दर्द तो वास्तविक है ही नहीं, सब आभासी हैं. फिर विकट त्रासदी में, रोते- बिलखते लोगों, बच्चों-औरतों की लाशों, बेवाओं के आसूं और अपने की तलाश में पथरा गयी आँखों को देखकर विचलित होने का सवाल ही कहाँ? कहते हैं-'पहले पेट पूजा फिर काम दूजा'- वही तो हुआ  है फिर आरटीआई और सीबीआई क्यों? और क्या होगा इनसे? न्याय...क्या कहाँ?....क्या यह शब्द अभी जिन्दा है?...इससे तो बजरंगी भाईजान अकेले ही निपट लेंगे. आज तक जांच  एजेंसियों से कुछ हासिल हुआ है..मात्र शोर-सराबा होने के. कुछ भी हो लोग आज भी विश्वासी हैं- यही सबसे बड़ा अपने आप में आश्चर्य है.

हमारा थोड़े ही था कोई वहां. फिर बेमतलब हम क्यों कष्ट सहें. मज़बूरी थी जाना पड़ा तो हम भूखे क्यों मरें. हम क्यों दूसरों के दुःख में दुखी हों. लोग तो वैसे ही मर रहे थे, दर्द  से कराह रहे थे, भूखे थे, प्यासे थे, शिविर कैम्प में थे. फिर हम आलीशान होटल का मजा क्यों न लें. वैसे भी लोग कहते हैं- “जाके पैर ना फटी बिवाई, का जाने उ पीर पराई.” यह हो भी क्यों नहीं जब सेनापति गड़बड़ हो तो सेना भी टके सेर खाझा, टके सेर भाजी जैसी ही होगी अथार्त यथा राजा तथा प्रजा. कुछ लोग तो अभी तक इसी मलाल में थे की राहत सामग्री हाथ नहीं लगी, जवानों की गिद्ध आँखे उनपर लगी रही, नहीं तो वह भी बिक सकता था, मदद के नाम पर भी पैसे बनाए जा सकते थे, अस्थाई व्यवस्थाओं से उगाही की जा सकती थी. गरीब लोगों की आबादी कम की जा सकती थी, उन्हें भूखे-प्यासे या इलाज के अभाव में मारा जा सकता था. पर देश के जवानों के उत्कट परिश्रम से मंसूबों पर पानी फिर गया.

आखिर भाई, यह देवभूमि थी, कोई देवलोक नहीं, यहाँ तो ताबूत तक से पैसे बनते हैं, जानवरों का चारा छीन लिया जाता है, बोफोर्स मगाई जाती है, 2G बिकवाली होती है, चिटफण्ड चलाये जाते हैं, कोयला आवंटन होता है, कॉमनवेल्थ गेम होता है. इन सबसे स्विस बैंक और मारीसस में सम्पन्नता आ रही है कितनी खुशी की बात है. पर आप लोग दूसरे की खुशी में खुशी नहीं हो सकते आपको तो एक औरत (जयललिता) को जेल भेजकर, राजू का मंत्रीपद छुड़ाकर खुशी मिलती है. सल्लू भाई की गाड़ी के नीचे आकर आपको चैन पड़ता है. तभी अभिजीत आपको गालियाँ देता है और प्रशासन उन्हें सुरक्षा. अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की भूमि कौन सी है काम तो फितरत के हिसाब से ही होता है.


साँप जाने के बाद लकीर पर लाठी पिटते रहो. यह आपकी खुशी है की सीबीआई बैठाओ या एफबीआई पर फितरत बदलने वाली नहीं, हमाम में तो सब नंघे है. फिर अब तो सच भी गुमनाम रास्ते जाकर भटक गया है इतनी जल्दी वह सही रास्ता पाने वाला नहीं.

Wednesday, 8 April 2015

कभी-कभी न जाने क्यों

Think About India



कभी-कभी  न जाने क्यों 
झुन्झुलाहत सी उभरती है 
 व्यग्र सा होता हूँ  
रास्ता  नहीं सूझता  
मन करता है सारी बेड़ियां तोड़ डालूँ 
और  लूँ निर्वासन 


पर क्या यह सहज  है 
झटके से बेड़ियां टूटटी  हैं ?
रात भर सोचता हूँ 
दाल-रोटी का झंझट 
चेहरे पर लगा चेहरा  
यहीं छोड़  दूँ आज 

चक्र ऐसा है... घूम जाता हूँ 
सुबह फिर बैग थाम निकल पड़ता हूँ 
रोज के रास्ते 
लिजलिजाहट भरी जिंदगी जीने 
नकली हंसी पे हँसने 
आँख से आंसू छलकाए बिना रोने 



शायद यही जिंदगी है...
जीवन है....
विकल्प है.... 
या कुछ ना कर पाने की 
मेरी खुद की चुभन है ?