Showing posts with label ग्रामीण एवं कृषि. Show all posts
Showing posts with label ग्रामीण एवं कृषि. Show all posts

Monday, 7 December 2015

Think About India

 
किसानी या खेती की समस्या सिर्फ किसानों कि समस्या नहीं है. यह पूरे समाज की समस्या है, क्योंकि खेत में जो भी पैदा होता है, वह हमारे फूड चेन में शामिल है. जो खेत से सफर भले ही शुरू करें, लेकिन मंजिल हमारी किचन ही होती है. इसलिए यदि कोई यह सोचता है कि वह इस सब से अलग है तो गलत है. खेती किसानी सिर्फ गांव देहात या खेत खलिहान की बात नहीं है, यह बात है आपकी हमारी और हम सभी के किचन की.
.
किचन कि समस्या सब की समस्या है, अतः यह प्रमुख समस्या है मानवता और जीवन की.....

Sunday, 2 August 2015

भविष्य निराशा‬

Think About India


चित्र-गूगल साभार
रासायनिक खेती के युग में
तुन कौन? ढूढते चिड़िया
देखते सपना स्वस्थ्य होने का
खा के जहर
न रहे कीट, गिद्ध
औरतों-बच्चों की संगी गौरैया
सावन में झूलते पीहर
हथ-चक्की, काड़ी के गीत
कुम्हार,कहार,भडभुजे,मुशहर,धोबी
भू-जल हुआ पीला
शिशु को अनीमिया
थकी आँखे चश्मे से झांकती
कैसे हो जिजीविषा शतवर्षीय
खेत-खलिहान, मेड़ें कब तलक
भार उठाये एक हड्डी मांस का
बैल-जोड़ी..संख्या मुहावरा संपन्न खेती का
नादीयां धुल फांकती, लुढ़कती इधर-उधर
गाँव के दरवाजे तक चला आया नगर
छीन गए तालाब-पोखरे
मयूर-कोयल, तितली-मेंढक
मिला क्या?
कंक्रीट, मन, दीवालों, को काली करती
फतफतहिया मोटर...


Friday, 24 July 2015

मिले हर दाने की वाज़िब कीमत

Think About India


अपनी जमा पूँजी लगाकर पेट भरने के लिए दिन-रात खटने वाले किसान की त्रासदी है की न तो उसकी कोई आर्थिक सुरक्षा है और न ही सामाजिक प्रतिष्ठा, तब भी वह अपने श्रम-कणों से मुल्क को सींचने के लिए तत्पर रहता है. किसान के साथ तो यह होता ही रहता है की कभी बाढ़ तो कभी सुखा. यदि कभी फसल अच्छी आ ही गई, तो मंडी में अंधा-धुंध आवक के चलते माकूल दाम नहीं. प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं है, लेकिन यह आपदाएं किसान के लिए मौत से भी बदतर होती हैं. किसानी महँगी होती जा रही है, तिस पर जमकर बाँट रहे कर्जों से उस पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में आपदा के समय महज कुछ सौ रुपए की राहत राशि उसके लिए ‘जले पर नमक’ की मानिंद होती है.सरकार में बैठे लोग किसान को कर्ज बांटकर सोचते रहते हैं कि इससे खेती-किसानी की दशा बदलेगी, जबकि किसान चाहता है की उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिले. देश के सकल घरेलु उत्पाद का 31.8 प्रतिशत भाग खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा ओता है, पर यह विडंबना ही है की देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है. एक बात जान लेना जरुरी है कि किसान को न तो कर्ज चाहिए और न ही कोई छुट-सब्सिडी. उसके उत्पाद का उसी के गाँव में बिक्री और सुरक्षित भण्डारण की व्यवस्था की जाय. किसान को सब्सिडी से ज्यादा जरूरी है की उसके खाद-बीज व दवा के असली होने की गारंटी हो. अफरात फसल के हालत में किसान को बिचौलियों से बचाकर सही दाम दिलवाने के लिए जरुरी है की सरकारी एजेंसियां गाँव जाकर खरीदारी करें.
सब्जियां, फल-फूलों जैसे उत्पादों की खरीद एवं बिक्री स्वयं सहायता समूहों आदि के माध्यम से करना कोई कठिन काम नहीं है. एक बात और. इस काम में होने वाला व्यय, किसी नुक्सान के आकलन की सरकारी प्रक्रिया, मुआवजा वितरण आदि में होने वाले व्यय से कम ही होगा. कुल मिलाकर किसान के उत्पाद की कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे, लेकिन विडम्बना यही है की हमारे आर्थिक आधार की मजबूत कड़ी के प्रति न ही समाज और न ही सियासती दल संवेदनशील दिख रहे हैं. काश! कोई सरकार किसान को फसल के हर दाने की वाज़िब कीमत का आश्वासन दे पाती, तो किसी भी किसान को न कभी हाथ फैलाना पड़ता और न ही कभी आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ता.

Sunday, 7 June 2015

प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार हैं किसान

Think About India
आज देश में जो स्थिति बनी है वह किसी से छिपी नहीं है. देश में किसानों का बुरा हाल है. उनकी फसल पहले खेत में बेमौसमी बारिस की शिकार हुई बाद में मंडी में खुले में रखने के कारण और खरीद न होने से फिर से आई बारिश ने उन्हें तबाह कर दिया. आज भी किसान मंडी में जुटे हुए है पर रोज नए-नए बहाने उनके सामने रख दिए जा रहे हैं. किसान नेता उन्हें हड़ताल पर बुला रहे हैं पर किसान को समझ में नहीं आ रहा है की वह हड़ताल करें या आपने अनाज की फ़िक्र. खरीददारी न होने से उन्हें रोज-रोज मंडी के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. उन किसानों का हाल भी पूछने वाला कोई नहीं है जिन्होंने बंटाई पर, किराये के खेत पर खेती की थी. फ़सल उनकी ख़राब हुई है और मुआवजा भी उन्हें नहीं मिल रहा है. सरकार आश्वासन दे रही है और प्रशासन उनकी बातों पर गौर ही नहीं कर रही है. लेखपाल मौके का मुआयना किये बिना ही गिरावदारी की रिपोर्ट बना दे रहे हैं और लोगों को सौ-सौ, दो-दो सौ के चेक वितरित किये जा रहे हैं. यह घटना जले पर नमक छिड़कने से कम नहीं है.

हैरान, परेशान और खस्ता हाल किसान जहाँ पिछला बैंक लोन चुकाने की स्थिति में नहीं है उसपर भी उसे कुछ महीनों की मौहलत दी गयी है. बैंक बिना पिछला लोन चुकाए ऋण देने को तैयार नहीं है और सूद साहूकार मौके का फायदा उठाने के लिए तैयार बैठे हैं. किसान भी कहीं और से पैसा नहीं मिलते देख कर झक मारकर साहूकार के चंगुल में फ़सने के लिए मजबूर है. आज विकट स्थिति में जन-धन योजना का खाता खुलवाने का भी उसे कोई लाभ नहीं पहुँच रहा है.
भारी बारिश का सबसे बुरा असर उन गन्ना किसानों पर सबसे ज्यादा पड़ा है जिन्होंने इस साल गन्ना के साथ-साथ गेहूं की फसल बोई थी. चीनी मिलों ने गन्ने का पैसा नहीं दिया और जो गेहूं की फसल थी वो बुरी तरह खराब हो चुकी है. उन पर लाखों का कर्ज हो चूका है. उन पर दबाव बढ़ता जा रहा है. किसान कहते हैं बैंक वाले आते हैं, कर्ज़ मांगते हैं, उन्हें कर्ज़ नहीं वापस करेंगे तो ज़मीन वापस चली जाएगी. इसीलिए कई लोगों से मनमाने ब्याज के बाद भी पैसा उठाना पड़ता है.

ऐसी विषम परिस्थिति में भी सरकार कहती फिरती है कि कोई भी किसान फसल बर्बादी के कारण आत्महत्या नहीं करता क्योंकि किसान कमजोर नहीं होता. कोई उन्हें बता दो की किसान भी इसी मिट्टी में पले-बढ़े हैं उनकी भी सहनशक्ति होती है और जिसदिन वो जबाब दे जाती है वह भी हार मान लेते हैं. और आत्महत्या का दौर वही से शुरू हो जाता है.

ऐसा कहने वालों को चाहिए वह किसानों की फिक्र करें क्योंकि वो जो रोटी खाते हैं वह इन्ही किसानों की मेहरबानी से मिलती. वह जब बिसलेरी की बोतल का पानी पीते हुए एअरकंडीशन कमरों में बैठ कर  ऐसी बकवास भरी बाते करते हैं तब किसान खेतों में खुले आसमान के नीचे जेठ की दुपहरिया में काम कर रहा होता है. यह भी सच है की किसान को मेहनत कभी नहीं थकाती पर दिन-रात मेहनत कर पाली गई फसल की दुर्दसा उसे थका देती है. उसका कृषि से मोहभंग कर देती है और उसे कारखाने का मजदूर बना देती है.

Thursday, 9 April 2015

खेती को बचाने के लिये बने कृषि सेज

Think About India

इन दिनों किसान मीडिया की सुर्खियों में है. आँखे बंद कर सुनो तो सुनाई पड़ता है की किसान करोड़पति है लेकिन आँखे खोल कर देखने पर पता चलता है कीफसल चक्र के एक सीजन में ओले पड़ने और बेमौसमी बारिस होने पर कैसे कई किसान रोड़ पर आ जाते हैं और कितने मज़बूरी बस आत्महत्या तक कर लेते हैं. महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, केरल के किसानों के लिए खेती सदैव जोखिमपूर्ण होती हैं और इसी की चलते ये इनका जीवन किसी सजा से कम नहीं होता. इन्हें यह भी पता नहीं होता की जी-तोड़ मेहनत के बाद क्या उत्पादन हासिल होगा. अधिकतर किसान बुनियादी सुविधावों से वंचित हैं. सिंचाई और सड़क से लेकर बिजली और लोन तक बहुत सी ऐसी जरूरी चीजें हैं जो या तो मिलती ही नहीं और यदि मिलती भी हैं तो बहुत कम. सब्सिडी के नाम पर भी धोखा ही दिया जाता है. मुआवजे सालों बाद पहुंचते हैं. किसान चंद ज्यादा रुपयों के लिए क्षेत्र की सबसे उपजाऊ और पैदावार वाली जमींन बेंच देते हैं, कभी इनपर भट्ठे लगा दिया जाता है तो कभी ये उद्योगपतियों के हाँथ में पहुँच कर इन पर कारखाने की चिमनी लगा देते हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर के कारोबार के चलते कितने खेतों पर गगंचुम्भी इमारतें लहरा रही हैं. रही सही कसर सरकारी परियोजनाए करती हैं. कभी इनसे होकर सड़क, हाईवे पास हो जाते हैं तो कभी नहर. किसान बेचारा सिर्फ तमासा ही देखता रहता है.  

अब समय आ गया है कि खेती को भी बचाने के लिए कॉर्पोरेट सेज की तरह फार्म लैंड सेज यानि खेती की जमीन को स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन के तहत लाकर इन्हें हाई वैल्यू फसलों के लिये तैयार किया जाये. उपजाऊ जमींन का अधिग्रहण होने से बचाया जाय. अधिकतर सरकारी परियोजनाओं को ऊसर भूमि में तैयार करने का उद्यम किया जाय. अगर ध्यान से देखें तो एनसीआर और उसके आस-पास के क्षेत्र यानि गाज़ियाबाद, बुलंदशहर, बागपत, मेरठ, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुडगाँव, फरीदाबाद, मेवात, रोहतक, सोनीपत, रेवाड़ी, झज्जर, पानीपत,पलवल, महेंद्रगढ़, भिवानी, जींद, करनाल की अधिकांश उपजाऊ जमींन पर विनिर्माण कार्य तेजी से जारी हैं और यहाँ से खेत लगभग ख़त्म होते जा रहे हैं. एक दौर ऐसा भी था जब यहां गेहूं, गन्ना, बाजरा और सब्जियों की बढिय़ा फसल होती थी...इतनी बढिय़ा कि देश भर में इसकी चर्चा होती थी.

दिल्ली जैसे उस केंद्र शासित प्रदेश में जहां 1करोड़10लाख से ज्यादा आबादी के खाद्यान के लिए पड़ोसी राज्यों पर निर्भर होना पड़ रहा है और पड़ोसी राज्य के जिलों में भी इसके विस्तार की गुसपैठ के चलते वहां की खेती भी विकास की बलि चढाई जा रही है. विदित हो की 1999-2012 के बीच दिल्ली के घटक राज्यों में निर्माण कार्य 9.02% की दर से बढ़ोतरी जबकि खेती की जमींन में 7.52% की गिरावट दर्ज की गयी. और यह रुझान अभी भी जारी है. यह हालत सिर्फ दिल्ली महानगर का नहीं है बल्कि अन्य तीन महानगरों और तेजी से विकसित होते नगरों में भी यह प्रवृत्ति देखि जा रही है. विकास के नाम पर कंक्रीट का जाल फैलता जा रहा है और खेती-बाड़ी की हरियाली तेजी से घटती जा रही है. मैं विकास को ग़लत नहीं मानता पर खेती-बाड़ी को संरक्षित कर विकास के मार्ग पर बढ़ना ही सही उपाय है. इससे पर्यावरण और खाद्य संतुलन को बनाए रखने में मदद मिलाने के साथ-साथ लोगों को खेती से दूर जाने से भी बचाया जा सकता है. लेकिन उसके लिए खेती को लेकर वर्तमान रवैया बदलना होगा. इसका तरीका यह है कि पहले हम राज्य की जमींन को उसके उपजाऊपन के दृष्टिकोण से बाँट लें और उपजाऊ जमींन को  स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन यानि सेज़ बनाये घोषित कर दे. और यहाँ पर कृषि की जरुरत के सारे उत्पाद उपलब्ध कराए जाय. जैसा की सब जानते हैं की अनेक राज्यों में किसान बिजली, सिंचाई, लोन, बाजार तक पहुंच और सही कीमत जैसी सहूलियतों से वंचित हैं. स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन या सेज़ बनाने से उन्हें सुविधाएँ मिलनी शुरू हो जाएँगी और उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण पर भी लगाम लग जाएगा. इसके अलावा फल, फूल, सब्जी और औषधीय पौधों जैसे हाई वैल्यू फसल वाले इलाकों में सड़क, बाजार और स्टोरेज सुविधा जुटाने पर फोकस बढ़ाया जा सकता है. कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामिनाथन के अनुसार सेज़ का मुख्य लक्ष्य व्यावसायिक खेती के लिये ऊपजाऊ कृषि को बचाना है ताकि सरकार के कार्यक्रमों के हिसाब से इसका इस्तेमाल किया जा सके.  


सेज घोषित इलाके नगरों के आस-पास या नगरों में रहे तो ये शहरों के लिये गार्डन जैसा काम करेंगे, इससे तक तरफ जहाँ स्वच्छ ऑक्सीजन की सप्लाई होगी वहीँ दूसरी तरफ शहर के दमघोंटू प्रदूषण को घटाने में मदद मिलेगी. ऐसे क्षेत्रों में पर्यटन को भी आकर्षित किया जा सकता है. हर स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन में जमीन का मालिकाना हक किसान के पास रखकर इसे कॉपरेटिव की तरह भी चलाया जा सकता है या फिर इसे कॉमर्शियल एंटरप्राइजर को इस शर्त पर दिया जा सकता है की वह  इसका इस्तेमाल सिर्फ खेती के लिये करेगें और किसान को इसमें शेयरधारक बनाया जा सकता है. परन्तु हर हालत में  एग्रीकल्चर सेज का प्रबंधन शेयरधारक अथार्त किसान ही करें और सरकार या अन्य लोग नियामक की भूमिका में हों. दोनों परस्पर सहमती से यह तय करें कि स्टोरेज, कोल्ड स्टोरेज और मार्केटिंग के लिये क्या अतिरिक्त सुविधायें जुटाई जाने की जरूरत है. सरकार इस हेतु निजी निवेशकों को भी आमंत्रित कर सकती है. एक बार बुनियाद तैयार हो जाने के बाद किसान या निवेशक निर्यात के लिये फल, फूल, औषधीय पौधे और ऑर्गेनिक सब्जियों के उत्पादन की दिशा में हाथ आजमा सकते हैं. गैर-फसली सीजन में मसाले और अन्य फसलें ली जा सकती हैं. 

अब यह समय की मांग बन चुकी है की सरकार स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन की नीति को अंतिम रूप दे और कुल क्षेत्रफल में एक तय प्रतिशत भूमि रिजर्व करे जिसका इस्तेमाल फसल के साथ ही पर्यावरण को बचाने के लिये भी किया जा सके. सरकार को जलवायु, भूमि और जल की उपलब्धता को ध्यान में रखकर विशेष कृषि क्षेत्र की योजना बनाने की भी जरूरत है. इनमें हर एक क्षेत्र में वॉटर मैनेजमेंट की बेहतरीन सुविधायें हों. रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की सुविधा हो, बारिश और भूजल का बेहतर प्रबंधन हो और मलजल को रीसाइकल करने की व्यवस्था हो. बीज से लेकर खाद और ऋण तक सब कुछ एक ही जगह पर मुहैया हो और इनके लिये को-ऑपरेटिव का भी इस्तेमाल किया जा सकता है और प्राइवेट एजेंसियों का भी. अभी फार्म से घर तक का जो सिस्टम है वो इतना जटिल है कि किसान को बिक्री दर का 25-30 फीसदी पैसा ही मिलता है. किसान को अच्छा पैसा मिले, इसके लिये जरूरी है कि खेत का सीधा बाजार से जुड़ाव हो. एग्रीकल्चर सेज़ से व्यावसायिक फसलों के लिये उपजाऊ भूमि को बचाया जा सकेगा जिससे ताजा फल-फूल भी मुहैया होंगे और पर्यावरण भी बचा रहेगा. 

Saturday, 21 March 2015

बेमौसमी बारिश और तेज हवा की भेंट चढ़ी रबी फसल


लगातार हुई कई  दिनों की बारिश और आंधी ने  पूरे देश की रबी कृषि को नुकसान पहुचाया है. जिसमें गेंहू, आलू और दाल की फसल को भारी नुकसान पंहुचा है. इसके कारण रबी फसल के उत्पादन में 20% तक कमी आने का अंदेशा  लगाया जा रहा है.

बारिश और तेज हवा से जहाँ खड़ी गेंहूँ की फसल पूरी तरह से बिछ गयी है और उसकी बाली को भी नुकसान पहुंचा है वहीँ सरसों की पकी फसल ओले पड़ने के कारण पूरी तरह से दब गयी है और उसमें बीमारियाँ लगने का खतरा भी बढ़ गया है. मसूर, चना के खेत भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. आलू की बेड पर बारिश के कारण सड़ने का खतरा मंडरा रहा है. जौ की फसल को भी नुकसान पंहुचा है. नागपुर में बिन मौसम बारिश ने और तूफानी मौसम से संतरे की फसल के साथ आम और अंगूर के बाग भी क्षतिग्रस्त हो गए हैं. महाराष्ट्र में 100 करोड़ के करीब फसल उपज हानी होने की संभावना है. छत्तीसगढ़ में गेंहू की फसल के साथ-साथ मसूर की खड़ी फसल को भी नुकसान पहुंचा है.


उत्तर प्रदेश, राजस्थान हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में किसानों के लिए मुसीबत लेकर आई है. कई हिस्सों में खेतों में अत्यधिक पानी के बहाव से गेहूं, सरसों और आलू की फसलें व्यापक रूप से नष्ट हो गई हैं. मैनपुरी जिले में आलू की खुदाई पर बुरा प्रभाव पड़ा है और पानी ने फसल को बर्बाद कर दिया है. एटा-कासगंज क्षेत्र में तंबाकू की फसल नष्ट हो गई है. मथुरा जिले में किसानों ने तेज हवाओं के कारण गेहूं की खेती चौपट होने की शिकायत की. आगरा क्षेत्र में टमाटर, मटर और धनिया जैसी फसलों की खेती भी बर्बाद हो गई है. फतेहपुर सीकरी क्षेत्र में किसानों ने कहा कि अत्यधिक बारिश से आलू का रंग फीका पड़ सकता है और यदि खेतों से पानी निकाला नहीं गया, तो फसलें सड़ सकती हैं. हरियाणा के पटौदी में भी गेंहू की फसलें बिछ गयी है कमोबेश पंजाब में भी यही हाल है.


अब किसान भाइयों  को सबसे पहले पानी से भरे खेत से जल्द ही  पानी को निकालने की व्यवस्था करनी पड़ेगी  जिससे फसल को तुरंत होने वाले नुकसान को कम किया जा सके. इसके बाद उसमें बीमारियाँ न लग पाएं इसका भी उचित ध्यान रखना पड़ेगा.
किसानों का हिमायती
अजय कुमार त्रिपाठी

“बोए सपने काटे कर्ज : आज का किसान ग्लोबलाइजेशन तले"

सबके पेट को भरने वाला भारत का किसान आज खुद भूखों मर रहा है. उसके खेत में क्या खेती होगी वह भी ग्लोबलाइजेशन तय कर रहा है. सरकार बोली हरित क्रांति लाओ और वह कूद पड़ा यूरिया डाल कर,खेत को बीमार बनाकर पैदावार बढ़ाने में और अब सरकार कह रही है उन्नत तकनीकी अपनाओं तो वह अपने मित्र बैल के खूंटे खाली करने पर लगा हुआ है. इसकी जमीनों पर राजमार्ग और टाउनशिप प्लान बनाने का चलन चल निकला है जिसकी भरपाई ‘मुआवजा’ कर रहा है. किसानों की माँ-जमींन से उसे जब चाहे बेदखल कर दिया जाता है और वह चुप रहता है और अगर विरोध कर लाश बन जाय तो उसका भी मुआवजा रेट पहले से तय है. सरकार ने भी इन्हीं  के भरोसे पर बिना इससे पूछे सब को फ़ूड सिक्यूरिटी का चुनावी वादा दे दिया है. पर उसका उत्पादन सरकार को नहीं किसान को ही करना है और उसकी हालत ऐसी है की काटो तो खून नहीं.....

21वीं सदी है जमाना बदल गया है अब सबसे ऊपर हुआ करने वाला और जीडीपी में सबसे अधिक योगदान देने वाला किसान अब बहुत नीचे आ गया है. आईटी क्रान्ति के नारे बुलंद है. एसी के नीचे बैठकर कंप्यूटर चलाने वाला समृद्ध है, धूप के नीचे हल चलाने वाला काला है, वृद्ध है, रंक है. किसानों के लिए नीतियाँ भी वहीँ बनाते हैं जिन्होंने खेत पर काम नहीं किया होता,फसल होने में व्यावहारिक तौर वह कितनी परेशानियां होती हैं कभी नहीं समझा होता है. ऐसे लोग पांच सितारा होटलों में बैठकर किसानों के लिए नीतियां बनाते हैं. तो स्वाभाविक है की नीतियों की धरातलीय पृष्ठभूमि कितनी व्यावहारिक होगी?


पहले मौसम मेहरबान होता था. फसल लहलहाती थी. पेड़ों पर झूले पड़ते थे और आम के बौर से पूरा गाँव महक उठता था. पर अब आम के बाग खेत बन गए और खेत में गगनचुम्भी इमारतें लहराने लगीं हैं. दूध आज भी गाँव में होता है पर किसान का बच्चा दूध की बूंद को तरस जाता है और सारा दूध डेरी पर चला जाता है. बाजारवाद ने वहां भी रुख कर लिया है और लोग दूध-मट्ठा छोड़कर बर्गर, चाउमीन, सैंडविच के जाल में फंसते जा रहे हैं. कुरता-धोती के बदले जीन्स और टी-सर्ट चढ़ाया जा रहा है. किसान के मित्र 'बैल' के बदले दरवाजे पर चारपहिया खड़े करने का क्रेज बढ़ गया है. यंत्रो ने अवश्य उसकी खेती को सरल बनाया है पर यंत्र भी किसके पास हैं? गरीबों की सब्सिडी पर अमीर कब्ज़ा जमाये बैठे हैं.
     

अब मौसम ने भी किनारा कर लिया है. देश में नहरों की मौजूदगी भी बिखरी हुई है. जैसे तैसे करके होने वाली फसल ....खरीदने कोई नहीं आता है. सरकार आती है तो मुठ्ठी भर रुपयों के साथ. भारतीय अनाज जरुरत से ज्यादा होने पर वैश्विक बाजार में कीमत प्रतिस्पर्धा नहीं दे पाते और नकार दिए जाते हैं. सीमाकर ने महँगे मोबाइल टके के भाव कर दिए तो विदेशी फसलें भी टके के मोल मिलने लगीं और किसान फसलों में आग लगाने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

किसान की जान एकदम सस्ती हो गयी है इसीलिए महाराष्ट्र में पशु नहीं मरते, जितने तो किसान जहर खा लेते हैं. जिसके पास जहर के पैसे भी नहीं होते हैं वे खेत की ही किसी सूखी खेजड़ी से झूल जाते हैं. कपास की खेती करते हैं, पर पहनने को लंगोट के अलावा कुछ भी नहीं है. अब तो किसानों को भी मरनेकी आदत सी हो गई है. जिस दिन नहीं मरे, उस दिन लगता ही नहीं कि भारत में ग्लोबलाइजेशन है.


मजदूर किसान हितों को झंडा बनाकर आगे बढ़ी पार्टियाँ, हँसिया और गेहूँ की बाली, अपनी पार्टी कार्यालयों की दीवारों पर पुतवाती हैं. फिर अंग्रेज़ी में लेख लिखतीं हैं, भाषण देती हैं किसान दूर से ही उन्हें देखता रहता हैं..किसान नेता भी स्वार्थसिद्धि हो जाने पर किसानों से दूरी बना लेते हैं. सरकार आज लाचार हैं? इतनी कि, किसान भी नहीं.
ग्लोबलाइजेशन को ऑपरेशन कर देखें, तो यहाँ का किसान ...ऐसा लगता है कि पुरा पाषाणकाल में से निकलकर कोई आदिवासी आ पहुँचा है. लगता है कि ....इन्हें गुलाम बनाकर सिर्फ़ खेती करवानी चाहिए. ताकि हम वैश्वीकरणका शुक्रिया अदा कर सकें. आईटी क्रांति को दोनों कन्धों पर उठाकर नाँच सकें.
सामने नीचे बैठा ...विदर्भ के ही किसी स्वर्गीय किसान का बेटा, संग-संग नाच रहे ग्लोबलाइजेशन की बलइयां ले सके.

Thursday, 19 February 2015

कहीं भोजन ही जहर न बन जाय

मनुष्य को भोजन से उर्जा मिलती है और उसी उर्जा की सहायता से मनुष्य जीवन की सारी गतिविधियों को संचालित करता है. संतुलित भोजन से उसका स्वास्थ्य लाभ बना रहता है और वह बिमारियों से भी बचा रहता है. पर समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब भोजन ही विष बन जाय और उसे खाकर मनुष्य बीमार पड़ने लगे. ऐसे में किया भी क्या जा सकता है क्योंकि बिन भोजन के जिन्दा नहीं रहा जा सकता और जिन्दा रहने के लिए खाना जरूरी है.

आज खेतों में जिस तरह रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग हो रहा है और भूमिगत जल और नदियाँ प्रदूषित हो रहीं है उससे यह आशा कम ही हो जाती हैं की हरी और ताजी दिखने वाली सब्जी या अनाज खाकर  हमें उचित पोषण मिलेगा बहुत संभव है की वह हमें बीमार बना दें.
साधारण मनुष्य पहले तो खाने के लिए परेशान है उसके बाद खा के हो रही गंभीर बिमारियों से भी परेशान होना शुरू हो चूका है. उसका तो कंगाली में आटा गिला हो रहा है. वह न खाना खाकर स्वस्थ्य रह सकता है और न ही बीमार पड़ने पर फल खाकर ठीक हो सकता है.
इसी बात की पुष्टि खाद्यानों पर कीटनाशकों के प्रभाव को जानने के लिए किये गए "स्वास्थ्य और कोडेक्स मंत्रालय के अधीन भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (FSSAI) के तहत निर्धारित रूप में 16,790 नमूनों में से कुल 509 नमूने अधिकतम अवशेषी सीमा (MRL) के ऊपर पाए गए. जिसमें सब्जियों, फल, मसाले, चावल, गेहूं और अन्य खाद्य वस्तुओं नमूनों को शामिल किया गया था. MRL बरसात के मौसम में उगाई गयी सब्जियों में गर्मियों और सर्दियों की अपेक्षा अधिक पाया गया है. अध्ययन में यह बात भी उभर कर आई कि मांस, दूध और सतही जल नमूने  अधिकतम अवशेषी  सीमा (MRL) से निचे पाए गए हैं.
नमूनों को देश के विभिन्न भागों में स्थित विभिन्न थोक और खुदरा बाजार से एकत्र किया गया था और उन्हें 25 प्रयोगशालाओं में जांचने के बाद रिपोर्ट तैयार की गयी है.
रिपोर्ट के अनुसार, 7591 सब्जियों के नमूनों में से 221 नमूनों में MRL से ऊपर कीटनाशकों के अवशेष पाए गए. जिनमें पत्तागोभी, बैंगन, टमाटर, भिंडी, करेला, खीरा, हरी मटर और धनिया पत्तियों की अपेक्षा शिमला मिर्च, हरी मिर्च और गोभी के नमूनों में MRL अवशेषों से ऊपर की उच्च संख्या पाई गयी. वह कीटनाशक जो सामान्यतः नमूनों में MRL से ऊपर पाया गया Chlorpyrifos, ethion, acetamiprid, dichlorvos और cypermethrin थे.

फल के मामले में 2235 में से 36 नमूनों में MRL उच्च स्तर पर था जिसमें अंगूर में यह सबसे उच्च था. 1161 मसालों के नमूने में से, 128 नमूने में MRL उच्च था जिसमें इलायची में अवशेषों निहित की उच्च संख्या के ऊपर कीटनाशक पाए गए जिनमें मुख्य रूप से quinalphos, cyhalothrin-L, profenofos, bifenthrin, triazophos और cypermethrin थे.
अनाज में 886 चावल के नमूने से 73 नमूने, 823 गेहूं के नमूने से 39 नमूने  साथ ही 776 मछली नमूनों में से छह नमूनों में कीटनाशक स्तर MRL से ऊपर पाए गए. चाय और दालों में भी कीटनाशकों का स्तर MRL स्तर से ऊपर था.
सरकार इस विषय में संज्ञान नहीं ले रही है और दिल्ली में यमुना किनारे सब्जियां उगाई जा रही हैं जिसमें यमुना का विषैला पानी डाला जा रहा है. तमाम नदियों से नहरें निकल रहीं हैं और उनसे ही कृषि का एक बड़ा भू-भाग सिंचित हो रहा है. देश की मुख्य नदियों की हालत किसी भारतवासी से छुपी नहीं है. दिल्ली, नोइडा जैसे शहरों का जल स्तर भी प्रदूषित हो चूका है. किसान भी ज्यादा उत्पादन के लालच में उर्वरक के सहारे की कृषि कर्म में जुटे हुए हैं और उन्होंने कम्पोस्ट और हरी खाद को तो जैसे भूला ही दिया है. एक तरफ इससे जहाँ भू-प्रदुषण बढ़ रहा है वहीँ दूसरी तरफ लगातार दुधारू पशुओं की संख्या भी जनसंख्या के अनुपात में घटती जा रही है. जो लोग जैविक या जीरो बजट खेती कर रहें हैं उन्हें उचित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा. उन्हें अपने कृषि उत्पाद भी साधारण उत्पादों के साथ बेचने पढ़ रहे हैं. सरकार सिर्फ उत्पादन पर ध्यान दे रही है उसकी गुणवत्ता पर कोई जोर नहीं दे रही है.
यदि यह सब ऐसा ही चलता रहा तो लोग भोजन पाने के बाद भी मरने लगेंगे और हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पायेंगें. ऐसी स्थिति उत्पन्न हो उसके पहले ही हमें चेत जाना चाहिए और उर्वरकों का प्रयोग कम कर जैविक खेती की तरफ कदम बढ़ा देने चाहिए. 

Wednesday, 28 January 2015

बदलता मौसम और प्रभावित होती खेती



जलवायु परिवर्तन अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लगे लोगों के लिए महज समाचार और खबरे हैं. लेकिन सच यह है की हवा-पानी वाली इस समस्या से देर-सबेरे सबको दो-चार होना ही पड़ेगा. भारत में सूखे और बाढ़ की समस्या को जलवायु परिवर्तन के एक रूप में इसे देखा जा सकता है. जहाँ एक और बाढ़ की स्थिति होती है तो दूसरी तरफ सूखे का मंजर. तापमान और वाष्पीकरण में वृद्धि के कारण सूखाग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है. यह सच है की कृषि से भी जलवायु परिवर्तन पर असर पड़ रहा है तो दूसरी तरफ़  जलवायु परिवर्तन से कृषि भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पा रही.

जाहिर है की कार्बन-डाईऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस-ऑक्साइड, नाईट्रस-ऑक्साइड , सल्फर-डाईऑक्साइड जीवन के लिए आवश्यक हैं पर नियत मात्रा से अधिक हो जाने पर यह समस्या की जड़ बन जाते हैं. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की वातावरण में कार्बन-डाईऑक्साइड की मात्रा औद्योगिक क्रांति से पहले जहाँ 280 पीपीएम थी वही 1990 तक 353 पीपीएम हो गयी. आईपीपीसी के अनुसार हमारे क्रिया-कलापों के कारण प्रतिवर्ष वातावरण में 380 करोड़ टन घुलती है जिसे पेड़-पौधे, समुद्र द्वारा अपनी क्षमता के अनुसार सोखे जाने के बाद भी ½% अतिरिक्त कार्बन-डाईऑक्साइड वातावरण में मौजूद रहती है. मीथेन गैस में जहाँ 0.9% की वृद्धि दर है वहीँ नाईट्रस-ऑक्साइड 0.25% की दर से बढ़ रही है. इसके अतिरिक्त सीएफसी गैस भी स्थान, ऊंचाई और मौसम के अनुसार ग्रीनहाउस प्रभाव को घटाती-बढ़ाती रहती है. इस बढ़ते हुए तापमान या ग्लोबल वार्मिंग से जीवधारी, वृक्ष और मानव जाती सबके लिए खतरा बढ़ता जा रहा है. इससे स्वास्थ्य, आर्थिक, सुरक्षा, खाद्य उत्पादन तथा अन्य समस्याएं बढ़ती जा रही हैं.

एशिया, दक्षिण अफ्रीका, लेटिन अमेरिका जैसे देशों के गरीब किसान बरसात का मौसम बदलने से खेती करने में परेशानी उठा रहे हैं. यह उन्हें और गरीब बना रहा है. बारिश के इस बदलाव के कारण भारत और अफ्रीका के मक्का उत्पादन में करीब 15% की गिरावट देखी जा रही है. देश में फसल उत्पादन के  उतार-चढ़ाव का कारण कम वर्षा, अत्यधिक वर्षा, नमीं, फसलों पर कीड़े लगना आदि प्रमुख हैं.

जलवायु परिवर्तन के कुछ ऐसे भी कारण हैं जो फसलों को सीधे प्रभावित करते हैं-

औसत तापमान में वृद्धि

औद्योगिकी के शुरुवात से लेकर अब तक पृथ्वी के तापमान में करीब 0.8%की वृद्धि हो चुकी है. निश्चित तापमान पर उगने वाली फसलें इससे प्रभावित होती हैं. आज जहाँ आलू, गेंहू, जौ, सरसों की खेती हो रही है तापमान बढ़ने से उसकी खेती ना हो सकेगी. क्योंकि इन फसलों को ठंडक की जरुरत होती है. तामपान वृद्धि से मक्का, धान या ज्वार में कमी हो सकती है क्योंकि इन फसलों में अत्यधिक गर्मी के कारण दाने नहीं बनते या कम बनते हैं. अत्यधिक वर्षा से जहाँ फसलें नष्ट हो जाती हैं वाही हानिकारक कवक बढ़ जाते हैं, मिट्टी की नमी में बदलाव से मृदाक्षरण पर प्रभाव पड़ता है. वर्तमान में कृषि-भूमि से क्षरण के दर 5-7 टन  प्रति हेक्टेयर की बजाय 30 टन टन  प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष  से ज्यादा हो गया है.     

CO2 में वृद्धि से वातावरण में नमी की वृद्धि

CO2 की मात्रा बढ़ने से सूखे और आग के कारण बहुत सी उपयोगी जातियां नष्ट हो जाएँगी तथा उनकी जगह नुकसानदायक जातियां पनपेंगी. तेजी से बढ़ने वाले पेड़ों को कीड़ों से नुकसान पहुचेगा तथा चरागाहों में बढ़िया घास की पैदावार गिर जाएगी. हालाँकि इसके कारण पोधों की बढ़वार में फायदा होगा पर मिट्टी के ख़राब होने से फसल भी अच्छी नहीं होगी.
जहरीली गैसों का प्रभाव

इस समय वायुमंडल में सल्फर ऑक्साइड की 60% की मात्रा और नाइट्रोजन ऑक्साइड की 50% की मात्रा उत्पन्न होती है. वातावरण में नमी के संपर्क में आते ही ये गंधक, अम्ल और नाइट्रिक अम्ल बनातीं हैं जो अम्लीय वर्षा का कारण बनता है और जब इस वर्षा का पानी खेतों में मिलता है तो खेत की सतह को अम्लीय कर देता है जिससे मिट्टी के अंदर बसने वाले सूक्ष्म जिव-जंतुओं, जीवाणुओं, कवकों आदि को अम्ल की विषाक्तता नष्ट कर देती है. धरती की उपरी सतह के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं. मिट्टी की गुणवत्ता घट जाती है और पौधों का विकास बहुत धीरे पड़ जाता है.

ओजोन परत में कमी

सीएफसी गैसों  के कारण ओजोन परत कमजोर होती जा रही है. ओजोन परत के मात्र 1% छीजन से पराबैंगनी किरणों में 2% का इजाफा और उसी अनुपात में खाद्य और जीवन पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ता है.

जाहिर है की जलवायु में होने वाले बदलाव प्रत्यक्ष रूप से खेती को और अप्रत्यक्ष रूप से किसान की आर्थिक स्थिति, उत्पादन व उत्पादकता पर प्रभाव डालती है. इस लिए इस पर गंभीर रूप से विचार किया जाना चाहिए. 

किसान अपनी दिनचर्या बदल कर जलवायु परिवर्तन को कम कर सकते हैं. पेड़ों का संरक्षरण, खाना पकाने और प्रकाश  के लिए  के लिए गोबर-गैस का इस्तेमाल, रासायनिक उर्वरकों और छिडकाव  के स्थान पर जैविक खाद और नीम मिश्रित छिडकाव, वर्षा के पानी का संचय, वाहनों का कम-से-कम प्रयोग और अधिक-से-अधिक पेड़ लगाकर अपना सहयोग दे सकते हैं और अपनी खेती और खेती से होने वाले उत्पादन को बनाये रख सकते हैं.

Thursday, 15 January 2015

प्राथमिक साफ-सफाई और ग्रामीण जीवन #Rural #Life and Primary #Sanitation


 मुझे यदा-कदा गाँव में रहने और उनसे मिलाने का मौका मिलता ही रहता है. पर मुझे ग्रामीण जीवन की कुछ बाते सदा खटकती रहती हैं जिनमें साफ-सफाई का मुद्दा सबसे अहम् है. ग्रामीण लोग अधिकतर महिलाएं जागरूकता की कमी और अशिक्षा के चलते साफ-सफाई के कई ज़रूरी तथ्यों को नजऱअंदाज कर देते हैं.

 
भोजन बनाना एवं खाना

ग्रामीण भारत में घर की महिला ही भोजन बनाती है और साफ भोजन के लिए जरूरी है की वह पहले आपने हाथ साफ करे लेकिन गाँव की कोई महिला ऐसा नही करती. अधिकांश औरते कहती हैं की यदि हाथ में कुछ लगा रहा तो पानी से हाथ धुल लेती हैं नहीं तो कपडे से पोंछकर काम में लग जाती हैं. उसी हाथ से खाना बनाने के दौरान आग कम होने पर उपला और लकड़ी भी डालती जाती हैं. किसी-किसी घर में तो चूल्हे के धुएं की उचित निकासी की व्यवस्था भी नहीं होती. महिलाएं भी सबके खाने के बाद याद रहने पर हाथ धुल लेती हैं नहीं तो साड़ी या किसी भी कपडे में हाथ पोंछ कर खाना खा लेती है. आंगन में मक्खियों का साम्राज्य रहता है आप चाहे जितना भी बचना चाहों पर बच नहीं सकते एकाध मक्खी तो खाने पर बैठ ही जाती है. 


स्नान और कपड़े धुलना

आगरा के फतेहपुर सीकरी में औलेंडा ग्राम पंचायत में कई महिलाओं से पुछने पर यह भी पता चला की नहाने में सिर्फ पांच मिनट लगते है क्योंकि गाँव के लगभग सभी घरों में बाथरूम जैसी कोई व्यवस्था नहीं है. आंगन में ही रस्सी बांधकर पुरानी साड़ी बांधी है और पत्थर के चौके डालकर कुछ ऊंचाई तक ईंटें लगा रखी है. कोई आ न जाये इसलिए एकदम बेफ्रिक होकर नहीं नहा पातीं, जल्दी-जल्दी नहाकर भागना पड़ता है. आगे बताती हुई कहती हैं कि,  निरमा-साबुन इतना महंगा है कि साबुन-सर्फ से कपड़े हप्ते में सिर्फ एक या दो बार ही धोते पाते हैं. यदि किसी के घर में गुसलखाना है तो उसमें दरवाजा नहीं है. गुसलखाने से लगती हुई बाहर जाने वाली कोई नाली की व्यवस्था भी लगभग नहीं होती. अधिकांश घरों का पानी नजदीक के गड्ढे में या युहीं खुले में बहा दिया जाता है. जिसमें कीड़े और मच्छर को पनपने का मौका मिलता रहता है. यह बात सिर्फ आगरा के गाँव तक ही सिमित नहीं है बल्कि भारत के लगभग सभी गांव की कमोबेश यही स्थिति है. लगभग पुरुषों के कपड़े भी महिलाएं ही धुलती हैं.


शौचालय का प्रयोग

सुल्तानपुर के लम्भुआ ब्लाक के पांडेपुर और आजमगढ़ के अतरौलिया में सुखीपुर ग्राम की महिलाएं बताती हैं की यहाँ सभी महिलाएं खुले में शौच जाती हैं, जो शौचालय बने हैं वे नाम के ज्यादा हैं, काम के कम. किसी में दरवाजा नहीं तो किसी में गड्ढा ही नहीं खुदा. आगरा के कई ग्रामीण इलाकों में महिलाओं ने बताया कि हमें पानी दूर से लाना होता है ऐसे में हर शौच के बाद शौचालय में कम-से-कम एक बाल्टी पानी डालना होता है तो ऐसे में हम बाहर जाना ही ज्यादा पसंद करते है.

पुरुष वर्ग आज भी शौचालय में जाना पसंद नहीं करते. वे इसे जनानियों के लिए जरूरी मानते हैं. गाँव के बूढ़े लोग कहते हैं की हमारी तो उम्र गुजर गयी खेत में जाते हुए तो अब मरने की बेला में हम इसमें नहीं जायेंगे फिर खेत के खुले का आनंद का अलग है.


बर्तन धुलना और शौच के बाद हाथ धुलना

गाँव के लगभग सभी घरों में राख और धान की भूसी से बर्तन धुले जाते हैं. बर्तन धुलने का स्थान कुछ ज्यादा साफ-सुथरा नहीं होता. शौच के बाद आधे से अधिक लोग मिट्टी से और शेष चूल्हे की राख से अपने हाथ धुलते हैं. साबुन से हाथ धोने वाली पुरुष तो नजर आ जाते हैं पर कोई औरत यदा-कदा ही नजर आती है.

इलाहाबाद के मऊआईमा की रुख्शाना कहती हैं की- हमार परिवार म तो सभी जनानी शौच के बाद मिट्टी से ही हाथ धोती हैं! भईया बड़ा परिवार बा ,साबुन-सरफ के खर्चा वेसनय बहुत बा.बर्तन के विषय में पुछने पर बताया की-माटी और राखी से सब बर्तन माजत हैं.  

दूसरी तरफ यदि डॉक्टरों की मानें तो गाँवों में लोग खुले में शौच और खेतों पर काम करने के लिए नंगें पैर चले जाते हैं जिससे उनके शरीर में कीड़े पहुंच जाते हैं, जो आंतों में पहुंचकर खून चूसते हैं और उससे  शरीर में खून की कमी हो जाती है.  दूसरी तरफ मिट्टी और राख से बर्तन मांजने पर भी सबके बीमार होने का खतरा बना रहता है. खाने-पीने में साफ-सफाई न होने से अतिसार, हैजा, जुकाम, पेट की कई बीमारियां और बच्चों में डायरिया जैसी समस्या होती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार डायरिया से भारत में 4 लाख बच्चे मर जाते हैं जिन्हें सिर्फ साफ-सफाई पर ध्यान देकर बचाया जा सकता है. लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के अनुसार, कायदे से हाथ धोकर 47 प्रतिशत तक डायरिया के खतरे को कम किया जा सकता है. विश्व बैंक की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 53 प्रतिशत लोग खुले में शौच जाते हैं.


खाने-पीने का सामान दुकानों पर खुला रख कर बेचना

गांवों में भी चाउमीन, बर्गर, टिक्की, समोसा, ब्रैड-पकोड़ा, पानी-पूरी, सिकंजी ने अपनी जगह बना ली है,जूस की दुकाने भी लगी होती हैं. नास्ते और मिठाई की दुकानों का कहना ही क्या? सभी-की-सभी में सामान खुला ही रहता है और उससे मधुमक्खी, चींटे और मक्खी अपना आहार ले रही होती हैं. सड़क के किनारे होने के कारण धूल आना तो स्वाभाविक ही है. मिठाईयां भी गाँव के लोग रोज-रोज नहीं खरीदते  तो वह कितनी बासी होती है यह आप खुद समझ सकते हैं. ऐसी चीजे खाकर आदमी बीमार नहीं पड़ेगा तो और क्या होगा. 
    
मासिक धर्म के दौरान कपड़े का इस्तेमाल

ग्रामीण महिलाएं अपनी व्यक्तिगत साफ-सफाई को भी नजरअंदाज करती हैं. ज्यादातर महिलाएं और किशोरियां मासिक धर्म के दौरान पुराने कपड़े को फाड़ कर उसका इस्तेमाल करती हैं,  कपडे को भी सबकी नज़रों से छुपा कर विशेष रीति से सुखाया जाता है. जिससे वह कई बार बिना पूरी तरह सूखने से पहले ही दुबारा इस्तेमाल में ले लिया जाता है. उससे इन्फेक्शन होने का ख़तरा होने के साथ यौन रोग होने की संभावना भी बढ़ जाती है.
 
जब हमारे द्वारा इस विषय पर बातचीत करने की कोशिश की गयी तो लगभग सभी बात करने से कतराने लगी. सैनेटरी पैड्स के विषय में पूछने पर पता चला की उसके विषय में लगभग सभी को पता है. पर कोई दुकान से उसे नहीं खरीदता. क्योंकि पहले तो वह महंगा होता है, दुसरे वह आस-पास नहीं मिलता और तीसरे बाजार में अधिकांश दुकानदार आदमी होता है.

दुनिया भर में सामाजिक मुद्दों पर सर्वे कराने वाली संस्था नीलसन द्वारा साल 2011 में भारत में किए गए एक अध्ययन के अनुसार 81 फीसदी ग्रामीण महिलाएं मासिक धर्म के दौरान कपड़े का प्रयोग करती हैं.


डॉक्टरी सलाह

ग्रामीण भारत में जल्दी डॉक्टर से परामर्श नहीं लिया जाता, छोटे-मोटे रोगों का इलाज खुद देसी दवा से करने की कोशिश की जाती है जब बात नहीं बनती तब अस्पताल ले जाया जाता है ऐसे में कई लोग तो  बीच रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं. साधारण चोट या घाव हो जाने पर सुरती, मिट्टी का तेल, चुना लगाया जाता है और किसी भी पुराने कपड़े से बांध दिया जाता है. घाव पके नहीं इसलिए गर्म सरसों का तेल उस पर डाल दिया जाता है. फोड़ों पर मदार का दूध, कान दर्द करने पर केले का पानी या गेंदे की पट्टी का पानी चम्मच में उबाल कर कान में डाल दिया जाता है. लोग कहते है की यहाँ तो रोज किसी-ना-किसी को चोट लगी रहती है तो कितना टिटनेस के फार लगवावें. मलेरिया, टिटनेस, केंसर जैसे रोगों का पता भी उनकी अंतिम स्टेज में ही लग पाता है. महिलाएं गाँव में महिला डॉक्टर के ना होने के चलते पुरुष डॉक्टर से यौन रोग के विषय में बात करने में भी झिझकती हैं.


मुख्य समस्या  

ग्रामीण लोगों से बात कर यह तो साफ हो गया की उनकी साफ-सफाई की समस्याएं जागरूकता की कमी, अशिक्षा, निर्धनता और काम की अधिकता से जुड़ी है. जिसके चलते वह चाह कर भी सम्पूर्ण स्वच्छता हासिल नहीं कर सकते. लगातार उड़ती हुए धूल-मिट्टी रसोई तक आती है. एक-काम-के बाद दूसरा लगा रहता है ऐसे में दाना-चबेना तो बिना हाथ धुले ही किया जा सकता है क्योंकि हाथ धुलने के बाद हाथ पोंछने की भी समस्या खड़ी हो जाती है और परिवार बड़ा होने के कारण तौलिया का इस्तेमाल संभव नहीं है.

प्रभावी कदम

ग्रामीण लोगों को जानकर मुझे लगता है की पुरुषों में जानकारी तो है पर उनमे जागरूकता नहीं है और महिलाओं को ना जानकारी है और ना जागरूकता. सरकार, निजी क्षेत्र और एनजीओ को इस विषय पर काम करने की जरूरत है. कुछ मुद्दे सिर्फ उचित ध्यान देकर ही ख़त्म किये जा सकते हैं जैसे महिलाओं की स्थिति में यह भी महसूस किया गया की शौचालयों के साथ अनिवार्य रूप से हैंडपंप लगवाये जाएं और महिला डॉक्टर की भी ग्रामीण परिसर में व्यवस्था की जाय तो कुछ समस्या हल हो सकती है.