Sunday, 11 January 2015

तम्बुओं की नगरी बना प्रयाग #Prayag made #City of #Tents


संगम नगरी इलाहाबाद (प्रयाग) में पवित्र गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर हर वर्ष लगने वाला विश्व का सबसे बड़ा एवं हिंदुओं का सर्वाधिक प्रिय धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेला ‘माघ मेला’ पौष पूर्णिमा स्नान के साथ सोमवार से शुरू हो गया. इसी के साथ "माघ मकरगति रवि जब होई"-तुलसीदास का यह कथन एक बार फिर चरितार्थ हो गया.
इस मेले में सबसे अधिक भीड़ मकर संक्रांति के दिन तथा मेले का समापन फरवरी में महाशिवरात्रि के दिन होता है. वैसे तो संगम में हर समय स्नान करने का पुण्य मिलता है पर पर माघ मास में संगम स्नान का फल कई गुना बढ़ जाता है. जिसके चलते यहाँ संगम की रेतीली भूमि पर तंबुओं का एक अस्थाई शहर आबाद हो जाता है और वातावरण ईश्वरमय हो जाता है. सभी लोग ईश्वर ध्वनी, यज्ञ, साधना, प्रवचन से अपने अध्यात्मिक लाभ में बढ़ोत्तरी करने लगते हैं.
यह माघ मेले की ही महत्ता है की जब लोग रजाई से निकलने में सकुचाते हैं, कमरे में रूम-हीटर और बाहर निकलने पर ठण्ड से बचने के लिए शरीर पर मोटे-मोटे कपड़े डाले रहते हैं ऐसे मौसम में श्रद्धालु और संत-महात्मा टेंट में रात गुजार कर प्रातःकाल गंगा-यमुना के ठंडे पानी में स्नान करते हैं और रात में गंगा आरती से गंगा जी की स्तुति करते हैं.
 

कल्पवासी:
माघ मेले में देश के कोने-कोने से कल्पवासी आते हैं और संगम तट पर रहकर पुण्य लाभ कमाते हैं.लोग  अपने काम से मुक्त होकर गाँव, क्षेत्र के लोगों के समूह में ट्रकों, बसों, ट्रैक्टरों, टैंपो आदि पर खाद्य सामग्री, बिस्तर व लकड़ी लेकर मेला क्षेत्र पहुंते हैं. फिर निर्धारित टेंट, पंडालों में धान के पुवाल के ऊपर अपना बिस्तर लगा कर सांसारिक जीवन से मुक्त होकर ईश्वर लाभ में जुट जाते हैं. इस दौरान वे साधारण जीवन जीते हुए संगम में हर रोज तीन बार आस्था की डुबकी लगाते हैं और एक ही बार भोजन करते हैं.
कल्पवास के दौरान हर कल्पवासी काम, क्रोध, मोह, माया से दूर रहने का संकल्प लेता है. कल्पवासियों के लिए यह एक महीना इसलिए भी बेहद अहम होता है क्योंकि इसके बाद उन्हें फिर से अपने-अपने सांसारिक कामों में लग जाना होता है. इसलिए हर कल्पवासी ध्यान, दान और पुण्य कमाने के इस मौके को हर तरीके से आत्मसात करने में जुटे होते हैं. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक कल्पवास करने वाले शख्स को ब्रह्मा की तपस्या करने के बराबर फल मिलता है.
 

मुख्य पर्व:
माघ मेले के दौरान छह प्रमुख स्नान पर्व होते हैं। इसके तहत पौष पूर्णिमा, मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि के स्नान पर्व प्रमुख हैं. इन पर्वों पर भीड़ काफी ज्यादा हो जाती है. जो लोग कल्पवास नहीं कर पाते वे लोग इन पर्वों पर स्नान और दान-धर्म कर ही अपना जीवन सफल बनाने का प्रयास करते हैं. मुख्य पर्व पर भीड़ इतनी होती हैं कि मेला क्षेत्र में सिर्फ सर ही सर  दिखाई पड़ते हैं और हर तरफ भीड़ का हुजूम सा लगा रहता है.
 

विकास मेला:
धार्मिक महत्त्व के अलावा यह मेला एक विकास मेला भी है तथा इसमें धार्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा पारंपरिक हस्त शिल्प, भोजन और दैनिक उपयोग की पारंपरिक वस्तुओं की बिक्री भी की जाती है. इसको लेकर स्थानीय छोटे-बड़े विक्रेताओं में उत्साह बढ़ जाता है. श्रृंगार का सामान, धार्मिक किताबे,पूजा सामग्री, फूल-फल और खाद्य सामग्री की दुकाने, सी.डी., खिलोने, गुब्बारे बेचने वालों की इस दौरान बिक्री कई गुणा बढ़ जाती है. इसके अतिरिक्त झूला, सर्कस, अंधा कुआ का खेल, सर्प से खेलनी वाली लड़की, जादू-तमासे वालों का भी व्यवसाय यहाँ चल निकलता है. अब लगभग हर कंपनी अपने उत्पाद का प्रचार यहाँ अवश्य करती है और उसे अपने ग्राहकों तक पहुचने में भी आसानी होती है.

बहती है अध्यात्मिक गंगा और चलते हैं भंडारे:
माघ मेले में महीने भर अध्यात्मिक गंगा बहती है. हर हिन्दू पंथ, साम्प्रदाय के गुरु यहाँ विराजमान होते हैं जिनके दर्शन मात्र के लिए लोग जाने कहाँ-कहाँ तक की यात्रा कर आते हैं. वे महीने भर संगम क्षेत्र में अपने पंडाल में मौजूद रहकर भक्तो और दर्शनार्थियों में अपनी अमृत वाणी से आध्यात्मिकता का संचार करते हैं. वह आपके उलझनों का समाधान कर आपकी समस्या का निराकरण भी करते हैं. रामायण, महाभारत, कृष्ण लीला आदि का प्रदर्शन एवं झाकियां लगाई जाती हैं. महीने भर संगम क्षेत्र में भंडारे और प्रसाद का वितरण होता रहता है.


कथाएँ:
प्रयाग, उत्तरकाशी, हरिद्वार इत्यादि स्थलों का माघ मेला प्रसिद्ध है. पर इनमे सबसे प्रसिद्ध प्रयाग का माघ मेला है. कहते हैं, माघ के धार्मिक अनुष्ठान के फलस्वरूप प्रतिष्ठानपुरी के नरेश पुरुरवा को अपनी कुरूपता से मुक्ति मिली थी. वहीं भृगु ऋषि के सुझाव पर व्याघ्रमुख वाले विद्याधर और गौतम ऋषि द्वारा अभिशप्त इंद्र का भी उद्धार माघ स्नान के महाम्त्य से ही हुआ था. पद्म पुराण के महात्म्य के अनुसार-माघ स्नान से मनुष्य के शरीर में स्थित उपाताप जलकर भस्म हो जाते हैं. पौराणिक मान्यताओं के आधार पर कहा जाता है की प्रयाग के माघ मेले में आने वालों का स्वागत स्वयं भगवान करते हैं.
माघ मेले की प्रसिद्धि के पीछे दो अन्य मुख्य कथाएँ हैं-
  • प्रथम कथानुसार समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ के लिए देवताओं और असुरों में महासंग्राम हुआ और देवताओं ने अमृत कलश को दैत्यों से छिपाने के लिए देवराज इंद्र को उसकी रक्षा का भार सौंपा गया. इंद्र पुत्र जयंत ने दैत्यों ने अमृत को बचाने के क्रम में अमृत कलश को 'मायापुरी' (हरिद्वार), प्रयाग (इलाहाबाद), गोदावरी के तट पर नासिक और क्षिप्रा नदी के तट पर अवंतिका (उज्जैन) में रखा था. इन स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें छलक गई थीं, जिसके कारण इन तीर्थों का विशेष महत्व है.
  • पद्मपुराण की एक अन्य रोचक कथा के अनुसार, भृगु देश की कल्याणी नामक ब्राह्मणी को बचपन में ही वैधव्य प्राप्त हो गया था. इसीलिए वह विंध्याचल क्षेत्र में रेवा कपिल के संगम पर जाकर तप करने लगी थी. इसी क्रम में उसने साठ माघों का स्नान किया था. दुर्बलता के कारण उसने वहीं पर प्राण त्याग दिए थे, किंतु मृत्यु के बाद माघ स्नान के पुण्य के कारण ही उसने परम सुदंरी अप्सरा तिलोत्तमा के रूप में अवतार लिया. इसी क्रम में कई किंवदंतियाँ और कथाएँ और भी हैं.


दर्शनीय स्थल:
संगम के आस-पास कई मंदिर और दर्शनीय स्थल हैं जिनमें बड़े (लेते) हनुमान जी का मंदिर, शंकर विमान मंडप, अकबर किला एवं उसमें स्थित अक्षय वट, मनकामेश्वर मंदिर, नागवासुकी मंदिर, अलोपी माई मंदिर, कल्याणी देवी, समुद्र कूप, तक्षकेश्वर नाथ मंदिर, वेणी माधव मंदिर आदि प्रमुख हैं.

पोंतून पुल:
प्रयाग मेले के विशेषता पोंतून पुल भी है जिससे लाखों की भीड़ को नदी के इस पार से उस पार जाने में दिक्कत नहीं होती. पोंतून पूल से नदी के बीचों-बीच पहुचकर नदी को बहते हुए देखने का मजा ही अदभुत होता है. मन ऐसा रमता है की गंगा को बस एकटक देखते ही रह जाएँ.


मेले का महत्त्व: 
माघ मेले की छोटी-छोटी कुटियों में एक अलग ही दुनिया बसती है. अलग-अलग जगहों से आकर लोग यहां शांतिपूर्वक एक परिवार की तरह रहते हैं और सब अध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की उम्मीद में लगे रहते हैं. कल्पवास के दौरान एक महीने तक लोग भक्ति में लिप्त रहते हैं. इसके अतिरिक्त भी रोज लोग संगम स्नान कर और साधु-महात्माओं के दर्शन कर पुण्यलाभ कमाते है. लोग दूर-दूर से आये लोगों से मिल-जुल कर अपने ज्ञान में बढ़त करने के साथ-साथ सात्विक जीवन जीने की सीख सीख कर जाते हैं. इस मेले से कितने ही श्रमिकों को रोजगार मिलता है और कंपनियों को अपने उत्पाद को दिखाने का मौका मिल पाता है. आस-पास के लोग शाम को यहाँ घुमने आते हैं और शाम की रोनक कहते नहीं बनती. पूरा मेला क्षेत्र बिजली के बल्बों से जगमगा रहा होता है और हर पंडाल से भजन-कीर्तन, प्रभु स्तुति की धुन दूर से ही सुनाई देने लगती है. यहाँ आकर फिर वापस लौटने का मन नहीं होता. 



माघमासे गमिष्यन्ति गंगायमुनसंगमे।
ब्रह्माविष्णु महादेवरुद्रादित्यमरुदगणा:॥

अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, रुद्र, आदित्य तथा मरुद्गण माघ मास में प्रयागराज के लिए यमुना के संगम पर गमन करते हैं.

प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नानस्य यद्भवेत्।
दशाश्वमेधसहस्त्रेण तत्फलं लभते भुवि॥
प्रयाग में माघ मास के अन्दर तीन बार स्नान करने से जो फल मिलता है, वह पृथ्वी पर दस हज़ार अश्वमेध यज्ञ करने से भी प्राप्त नहीं होता, ऐसा माना गया है.