Thursday, 9 April 2015

खेती को बचाने के लिये बने कृषि सेज

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इन दिनों किसान मीडिया की सुर्खियों में है. आँखे बंद कर सुनो तो सुनाई पड़ता है की किसान करोड़पति है लेकिन आँखे खोल कर देखने पर पता चलता है कीफसल चक्र के एक सीजन में ओले पड़ने और बेमौसमी बारिस होने पर कैसे कई किसान रोड़ पर आ जाते हैं और कितने मज़बूरी बस आत्महत्या तक कर लेते हैं. महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, केरल के किसानों के लिए खेती सदैव जोखिमपूर्ण होती हैं और इसी की चलते ये इनका जीवन किसी सजा से कम नहीं होता. इन्हें यह भी पता नहीं होता की जी-तोड़ मेहनत के बाद क्या उत्पादन हासिल होगा. अधिकतर किसान बुनियादी सुविधावों से वंचित हैं. सिंचाई और सड़क से लेकर बिजली और लोन तक बहुत सी ऐसी जरूरी चीजें हैं जो या तो मिलती ही नहीं और यदि मिलती भी हैं तो बहुत कम. सब्सिडी के नाम पर भी धोखा ही दिया जाता है. मुआवजे सालों बाद पहुंचते हैं. किसान चंद ज्यादा रुपयों के लिए क्षेत्र की सबसे उपजाऊ और पैदावार वाली जमींन बेंच देते हैं, कभी इनपर भट्ठे लगा दिया जाता है तो कभी ये उद्योगपतियों के हाँथ में पहुँच कर इन पर कारखाने की चिमनी लगा देते हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर के कारोबार के चलते कितने खेतों पर गगंचुम्भी इमारतें लहरा रही हैं. रही सही कसर सरकारी परियोजनाए करती हैं. कभी इनसे होकर सड़क, हाईवे पास हो जाते हैं तो कभी नहर. किसान बेचारा सिर्फ तमासा ही देखता रहता है.  

अब समय आ गया है कि खेती को भी बचाने के लिए कॉर्पोरेट सेज की तरह फार्म लैंड सेज यानि खेती की जमीन को स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन के तहत लाकर इन्हें हाई वैल्यू फसलों के लिये तैयार किया जाये. उपजाऊ जमींन का अधिग्रहण होने से बचाया जाय. अधिकतर सरकारी परियोजनाओं को ऊसर भूमि में तैयार करने का उद्यम किया जाय. अगर ध्यान से देखें तो एनसीआर और उसके आस-पास के क्षेत्र यानि गाज़ियाबाद, बुलंदशहर, बागपत, मेरठ, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुडगाँव, फरीदाबाद, मेवात, रोहतक, सोनीपत, रेवाड़ी, झज्जर, पानीपत,पलवल, महेंद्रगढ़, भिवानी, जींद, करनाल की अधिकांश उपजाऊ जमींन पर विनिर्माण कार्य तेजी से जारी हैं और यहाँ से खेत लगभग ख़त्म होते जा रहे हैं. एक दौर ऐसा भी था जब यहां गेहूं, गन्ना, बाजरा और सब्जियों की बढिय़ा फसल होती थी...इतनी बढिय़ा कि देश भर में इसकी चर्चा होती थी.

दिल्ली जैसे उस केंद्र शासित प्रदेश में जहां 1करोड़10लाख से ज्यादा आबादी के खाद्यान के लिए पड़ोसी राज्यों पर निर्भर होना पड़ रहा है और पड़ोसी राज्य के जिलों में भी इसके विस्तार की गुसपैठ के चलते वहां की खेती भी विकास की बलि चढाई जा रही है. विदित हो की 1999-2012 के बीच दिल्ली के घटक राज्यों में निर्माण कार्य 9.02% की दर से बढ़ोतरी जबकि खेती की जमींन में 7.52% की गिरावट दर्ज की गयी. और यह रुझान अभी भी जारी है. यह हालत सिर्फ दिल्ली महानगर का नहीं है बल्कि अन्य तीन महानगरों और तेजी से विकसित होते नगरों में भी यह प्रवृत्ति देखि जा रही है. विकास के नाम पर कंक्रीट का जाल फैलता जा रहा है और खेती-बाड़ी की हरियाली तेजी से घटती जा रही है. मैं विकास को ग़लत नहीं मानता पर खेती-बाड़ी को संरक्षित कर विकास के मार्ग पर बढ़ना ही सही उपाय है. इससे पर्यावरण और खाद्य संतुलन को बनाए रखने में मदद मिलाने के साथ-साथ लोगों को खेती से दूर जाने से भी बचाया जा सकता है. लेकिन उसके लिए खेती को लेकर वर्तमान रवैया बदलना होगा. इसका तरीका यह है कि पहले हम राज्य की जमींन को उसके उपजाऊपन के दृष्टिकोण से बाँट लें और उपजाऊ जमींन को  स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन यानि सेज़ बनाये घोषित कर दे. और यहाँ पर कृषि की जरुरत के सारे उत्पाद उपलब्ध कराए जाय. जैसा की सब जानते हैं की अनेक राज्यों में किसान बिजली, सिंचाई, लोन, बाजार तक पहुंच और सही कीमत जैसी सहूलियतों से वंचित हैं. स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन या सेज़ बनाने से उन्हें सुविधाएँ मिलनी शुरू हो जाएँगी और उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण पर भी लगाम लग जाएगा. इसके अलावा फल, फूल, सब्जी और औषधीय पौधों जैसे हाई वैल्यू फसल वाले इलाकों में सड़क, बाजार और स्टोरेज सुविधा जुटाने पर फोकस बढ़ाया जा सकता है. कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामिनाथन के अनुसार सेज़ का मुख्य लक्ष्य व्यावसायिक खेती के लिये ऊपजाऊ कृषि को बचाना है ताकि सरकार के कार्यक्रमों के हिसाब से इसका इस्तेमाल किया जा सके.  


सेज घोषित इलाके नगरों के आस-पास या नगरों में रहे तो ये शहरों के लिये गार्डन जैसा काम करेंगे, इससे तक तरफ जहाँ स्वच्छ ऑक्सीजन की सप्लाई होगी वहीँ दूसरी तरफ शहर के दमघोंटू प्रदूषण को घटाने में मदद मिलेगी. ऐसे क्षेत्रों में पर्यटन को भी आकर्षित किया जा सकता है. हर स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन में जमीन का मालिकाना हक किसान के पास रखकर इसे कॉपरेटिव की तरह भी चलाया जा सकता है या फिर इसे कॉमर्शियल एंटरप्राइजर को इस शर्त पर दिया जा सकता है की वह  इसका इस्तेमाल सिर्फ खेती के लिये करेगें और किसान को इसमें शेयरधारक बनाया जा सकता है. परन्तु हर हालत में  एग्रीकल्चर सेज का प्रबंधन शेयरधारक अथार्त किसान ही करें और सरकार या अन्य लोग नियामक की भूमिका में हों. दोनों परस्पर सहमती से यह तय करें कि स्टोरेज, कोल्ड स्टोरेज और मार्केटिंग के लिये क्या अतिरिक्त सुविधायें जुटाई जाने की जरूरत है. सरकार इस हेतु निजी निवेशकों को भी आमंत्रित कर सकती है. एक बार बुनियाद तैयार हो जाने के बाद किसान या निवेशक निर्यात के लिये फल, फूल, औषधीय पौधे और ऑर्गेनिक सब्जियों के उत्पादन की दिशा में हाथ आजमा सकते हैं. गैर-फसली सीजन में मसाले और अन्य फसलें ली जा सकती हैं. 

अब यह समय की मांग बन चुकी है की सरकार स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन की नीति को अंतिम रूप दे और कुल क्षेत्रफल में एक तय प्रतिशत भूमि रिजर्व करे जिसका इस्तेमाल फसल के साथ ही पर्यावरण को बचाने के लिये भी किया जा सके. सरकार को जलवायु, भूमि और जल की उपलब्धता को ध्यान में रखकर विशेष कृषि क्षेत्र की योजना बनाने की भी जरूरत है. इनमें हर एक क्षेत्र में वॉटर मैनेजमेंट की बेहतरीन सुविधायें हों. रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की सुविधा हो, बारिश और भूजल का बेहतर प्रबंधन हो और मलजल को रीसाइकल करने की व्यवस्था हो. बीज से लेकर खाद और ऋण तक सब कुछ एक ही जगह पर मुहैया हो और इनके लिये को-ऑपरेटिव का भी इस्तेमाल किया जा सकता है और प्राइवेट एजेंसियों का भी. अभी फार्म से घर तक का जो सिस्टम है वो इतना जटिल है कि किसान को बिक्री दर का 25-30 फीसदी पैसा ही मिलता है. किसान को अच्छा पैसा मिले, इसके लिये जरूरी है कि खेत का सीधा बाजार से जुड़ाव हो. एग्रीकल्चर सेज़ से व्यावसायिक फसलों के लिये उपजाऊ भूमि को बचाया जा सकेगा जिससे ताजा फल-फूल भी मुहैया होंगे और पर्यावरण भी बचा रहेगा.