Tuesday, 14 April 2015

युद्धों की विभीषिका के बीच पिसता बचपन

Think About India

 आप ने सुना होगा की एक तस्वीर हजारों शब्दों से ज्याद के भाव संप्रेषित करने में सक्षम होती है. सोशल मिडिया पर वायरल हो रही नीचे की यह तस्वीर भी शायद इसी तथ्य को नायाब तरीके से संप्रेषित कर रही है.

विदित हो की यह चार वर्षीय बच्चा सीरिया का है जो अरसे से गृहयुद्ध का शिकार बना हुआ है. सरकार और असंतुष्ट विरोधियों के बीच निरंतर खूनी संघर्ष जारी है जिसमें रोज सैकड़ों बेगुनाह बलि चढ़ रहे हैं. जिसका खौफ वहां के समाज में व्याप्त हो गया है. जो दिनों-दिन गहराता जा रहा है और लोगों की नब्ज में शामिल होता जा रहा है. लोग इस खौफ़ में जीते हैं कि उनकी आख़िरी घड़ी कभी भी आ सकती है. बड़े-बूढों को तो छोड़ों बच्चों की आँखों में भी झाँक कर इसे देखा जा सकता है. और इसी संवेदना की नायाब प्रस्तुति इस तस्वीर में साफ़ झलकती हुई दिखाई पड़ रही है.

तस्वीर का प्रसंग यह था की सीरिया के राहत कैंप के बाहर एक फोटोग्राफर को इस प्यारे बच्चे की छवि अच्छी लगी और वह इस बच्चे की  छवि को अपने कैमरे में कैद करने के ज़ज्बात लेकर बच्चे के पास गया और अपना कैमरा निकालकर उसकी फ़ोटो लेनी चाही. पर जैसे ही फोटोग्राफर ने अपना कैमरा निकाला, बच्चे को आभास हुआ कि अजनबी हथियार निकाल रहा है. तुरंत ही उसने अपनी जिंदगी बख्श देने की याचना रूपी आत्मसमर्पण की मुद्रा में दोनों हाथ ऊपर कर लिए.

अब अगर इस फ़ोटो को ध्यान से देखें तो पाएंगे की बच्चे की गुमसुम आँखों में प्राण याचना, निःआपराधबोध भाव की बेबसी सरीखे तमाम स्वर, सुर्ख हो चुके गालों पर दहसत की ठहराव वाले भाव, सिले हुए होंठों और भिंची हुई मुट्ठी से मौन और बेकसूर होने का भाव बड़ी मासूमियत से उभर रहा है. पूरे शरीर से सामने खड़ी मौत का आतंक साफ़ उभरा हुआ दिख रहा है. इसके साथ इस दुनिया और उस समाज के प्रति नाराजगी का भाव भी उभर रहा है जिसमें वह बड़ी हो रही है. जहाँ अपने के बिछड़ने का दंस उन्हें रोज झेलना पड़ रहा है. बड़ों के अपने स्वार्थगत युद्धों में मासूमियत का सरेआम गला घुट रहा है.

उनके इस संत्रास की पराकाष्ठा इसी बात से उभर जाती है की यहाँ महज चार-पांच वर्षीय बच्चे भी रोज होने वाले खून-खराबे और आत्मसमर्पण की मुद्रा देखते-देखते इतने अभ्यस्त हो चुके हैं की किसी अजबनी या अपरचित से डर होने पर यह मुद्रा स्वतः बन जाती है.

आज जब हम खुद को और अपने समकालिक समाज को विज्ञानवादी और आधुनिक बोलकर इतराते हैं, गर्व के एक बोध से आत्ममुग्ध होते हैं और अपने पूर्व के प्रति हीनता से ग्रस्त होते हैं ;तभी भीतर से कहीं एक आवाज ये भी निकलती है कि ऐसी बर्बरता, अमानवीयता, असमानता और घृणा भी शायद ही किसी पूर्व के व्यक्ति या समाज में पायी जाती रही हो. राष्ट्र की लकीरों, मजहब के बंधनों, जाति की सीमाओं और रंगों के भेद ने इंसान को इंसान से बहुत दूर खड़ा कर दिया है; और इस दूरी ने जो घटाया है, वह है- प्रेम, शांति, सौहार्द, सहिष्णुता व बंधुत्व और जो बढ़ाया है, वह है-हिंसा, नफरत, घृणा, भेदभाव, व अविश्वास. अबूझ पहेली बन चूका है कि हम  तार्किकता से युक्त आज के इस आधुनिक दौर पर इतराएँ, या अपने चेहरे को चुल्लू भर पानी में डूबा कर  ख़ुद के द्वारा उत्पन्न इन स्थितियों पर शर्मिंदा हो लें! यह बच्चा हमारे अंतर्मन के "सीरियाई पक्ष" को उजागर कर गया. एक ऐसा ही बच्चा हमारे भीतर भी है जो उस द्वंद्व से भयभीत और नाराज खड़ा है. यह पेशावर अटैक और बोको हरम, आईएसआईएस के कारनामे  से भी समान रूपी दुखी है.
वैसे इस फ़ोटो को देख कर सबका मन उद्वेलित हुआ होगा क्यों की इस मासूम बच्चे की आँखों में उभरा मौत का खौफ इसकी नही वरन समूची मानवता की लाचारी बयां कर रहा है.और हम बरबस ये सोच उठते हैं कि काश हम कुछ कर पाते.