Tuesday, 6 January 2015

जब लड़का होना ही गुनाह हो जाय


आज दिल्ली मेट्रो में घटी एक घटना ने मुझे यह लिखने को विवश कर दिया. हुआ कुछ यों की दिल्ली मेट्रो की येलो लाइन वाली गुडगाँव जाने वाली मेट्रो जब साकेत पहुची तो वहाँ बहुत भीड़ थी कारण शायद इससे पहले कुतुबमीनार वाली मेट्रो गयी थी जिसके कारण भीड़ ज्यादा हो गयी थी. हमारी मेट्रो पहले से ही एकदम भरी हुए थी और जैसे ही वह साकेत रुकी लोग अन्दर आने के लिए धक्कम-मुक्कम करने लगे. इसी दौरान मेरे बगल लड़का शायद पीछे से आ रहे धक्के के कारण बगल खड़ी एक लड़की के ऊपर गिर गया और इसके पहले वह संभल पाता लड़की ने एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर रसीद कर दिया. जिससे घटना से अगल-बगल खड़े सारे लोगों का ध्यान उनकीं तरफ खिंच गया.
लड़के ने अपने गाल पर हाथ रखे हुए ही लड़की से कहा- “मैरा आपको धक्के देने का कोई इरादा नहीं था पर में लोगों द्वारा दिए गए धक्के से अपने आप को संभाल ना सका जिसके कारण मैं आपके ऊपर गिर गया.” इस पर लड़की बोली- चुप रहों! मुझे खूब पता है! तुम लोगों का इरादा क्या होता है? अब तुम मुझे मत समझाओ. मुझे पता है मेरे अधिकार क्या हैं और यह भी पता है की तुम जैसों से कैसे निपटना है.
जितने लोगों ने इस घटना को देखा किसी ने कुछ नहीं कहा बस दोनों को देखते रहे और मेट्रो चलती रही, स्टेशन आते रहे और लोग चढ़ते-उतरते रहें. पर अगर इस मामले में लड़की लड़के के ऊपर गिरी होती तो क्या लड़का लड़की को थप्पर मार पाता और यदि लड़का थप्पर मार देता तो अन्य सहयात्री क्या इसी तरह खामोश रह पाते. यह सोचने का विषय है.

इसे देखते ही मेरे जेहन में रोहतक मामला उभर आया कि शायद रोहतक मामले में भी कुछ इसी तरह की घटना हुई थी. जिसमें सीट को लेकर हुए विवाद के कारण तीन लड़कों को दो बहनों ने बेल्ट से पिटा और उन्हें हवालात का रास्ता तक दिखा दिया. लड़कों का चुनाव सेना के लिये हुआ था और वे तन्दरुस्त और अच्छी कद-काठी के थे. यदि तीनों लड़के चाहते तो लड़कियों की बुरी तरह पिटाई कर सकते थे पर उन्होंने हाथ नहीं उठाया. दूसरी बात हवालात  जाना आज भी किसी सभ्य परिवार के लिए गर्व की बात नहीं होती. उससे उन दोनों लड़कों को जो बेज्जती, पुलिस की प्रताड़ना और व्यापक दबावपूर्ण मानसिक वेदना झेलनी पड़ीं वह उन्हें किसी तरह वापस नहीं की जा सकती.
मुझे दिल्ली में मेरे साथ मुखर्जी नगर में कोचिंग ले रहे एक लड़के की घटना याद आती है. जो एक लड़की के साथ लिविंग रिलेशन में रह रहा था परन्तु कुछ कारणों से दोनों में मनमुटाव हो गया और वे दोनों अलग रहने लगे. करीब 6-7 महीने बाद ईश्वर की अनुकम्पा और दोस्त की मेहनत से उसका चयन सिविल सर्विस में हो गया. तब लड़की ने दोस्त पर शादी का झांसा देकर रेप करने का अरोप लगाया था.
आजकल लाखों युवा लिव-इन में रहते हैं. ऐसे में यदि लड़की शादी से इनकार कर दे तो सब ठीक रहता है. लेकिन लड़के ने शादी से इनकार किया तो लड़की मुकदमा कर देती है और लड़का बलात्कारी हो जाता है. यदि लड़कों को भी ऐसे मामले में लड़कियों पर बलात्कार का मुकदमा करने का अधिकार होता तो न जाने कितनी लड़कियां भी बलात्कारी घोषित हो चुकी होती.

मैं मेट्रो में आये दिन देखता हूँ की 20-30 साल की लड़की आती है और अगर लेडीज सीट पर कोई भी बैठा हो चाहे वह वृद्ध ही क्यों न हो, उसे उठा कर अपनी सीट पर बैठ जाती है. कई बार लेडीज सीट पर नवयुवती बैठी होती है और उसके सामने ही एक औरत अपनी गोंद में बच्चे को लेकर या बयोवृद्ध महिला खड़ी होती है फिर भी वह नवयुवती नहीं उठती.
ऐसे मामलों की भी लंबी-चौड़ी सूची मौजूद है जहां पैसे ऐंठने, बकाया वसूलने, जमीन जायदाद के झगड़े निपटाने या विवाहेत्तर संबंधों के कारण बलात्कार के झूठे मुकदमे दर्ज किए गए हैं. ससुराल गयी लड़की की खुद की गयी आत्महत्या को भी कई बार ससुराल पक्ष के ऊपर दहेज़ हत्या बताकर मामला दर्ज किया जाता है और उसमे बच्चों, बूढ़ों, लड़कियों और रिश्तेदारों तक को बेवजह फसा दिया जाता है.  
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी इन बातों का काफी हद तक समर्थन करते हैं. दिल्ली में 2012 में जहां बलात्कार के मामलों में 46 प्रतिशत लोग ही बरी हुए थे वहीं 2013 के शुरुआती आठ महीनों में यह आंकड़ा बढ़कर 75 प्रतिशत हो गया. इसका मतलब है कि इस दौरान दिल्ली में सिर्फ 25 प्रतिशत आरोपितों को ही सजा हुई है और बाकी सब बरी हुए हैं. हालांकि इन आंकडों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बरी होने वाले सभी 75 प्रतिशत मामले झूठे ही थे. लेकिन कई न्यायाधीशों के फैसलों और टिप्पणियों से झूठे मामलों की पुख्ता जानकारी जरूर मिलती है.

लड़कियों, महिलाओं और उनके परिवार वालों को यह समझना चाहिए की जब आपके पास अधिकार आते  हैं तब आपकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. अधिकार का बेवजह गलत इस्तेमाल इसलिए करना की कोई परेशान हो या किसी को चोट पहुचे सर्वथा ही गलत है. यह सच है कि ‘बलात्कार और दहेज़’ के मामले में पीड़िता को बहुत ज्यादा पीड़ा और अपमान सहना पड़ता है. लेकिन ठीक इसी तरह बलात्कार के झूठे आरोप लगाए जाने पर आरोपित लड़के को भी उतनी ही पीड़ा और अपमान का सामना करना पड़ता है. उसके आगे का जीवन नारकीय हो जाता है. आयेदिन ऐसे कितने लोग हैं जो इस कारण अवसाद में आकर आत्महत्या कर लेते हैं. इससे आरोपित का जीवन तो हमेशा के लिए प्रभावित होता ही है साथ ही न्यायालय में मुकदमों की संख्या में भी अनावश्यक बढ़ोत्तरी होती है. जिससे सही भुक्तभोगी को न्याय मिलने में देर होती है.