Tuesday, 3 February 2015

स्वामी विवेकानंद की परीक्षा


बात उस समय की है जब विवेकानंद शिकागो धर्मसभा में भारतीय संस्कृति पर बोलने के लिए आमंत्रित किये गये थे. शिकागो जाने से पहले विवेकानन्द स्वामी रामकृष्ण जी पत्नी मां शारदा के पास आशीर्वाद लेने पहुंचे. मां ने उन्हें वापस भेजते हुआ कहा, कल आना. पहले मैं तुम्हारी पात्रता देखूंगी. उसके बाद ही मैं तुम्हें आशीर्वाद दूंगी. दूसरे दिन विवेकानंद आए तो उन्होंने कहा, अच्छा आशीर्वाद लेने आया है. पर पहले मुझे वह चाकू तो पकड़ा. मुझे सब्जी काटनी है, फिर देती हूं तुझे आशीर्वाद. गुरूमाता की आज्ञा मानते हुए जैसे विवेकानन्द जी ने पास पड़ा चाकू गुरू मां को दिया मां का चेहरा प्रसन्नता से खिल गया. उन्होंने कहा जाओ नरेंद्र मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ रहेगा. स्वामी विवेकानंद जी आश्चर्य में पड़ गए. वे यह सोच कर आए थे कि मां उनकी योग्यता जांचने के लिए कोई परीक्षा लेगी लेकिन वहां तो वैसा कुछ भी नही हुआ. विवेकानंद जी के आश्चर्य को देखकर माता शारदा ने कहा कि प्रायः जब किसी व्यक्ति से चाकू मांगा जाता है तो वह चाकू का मुठ अपनी हथेली में थाम देता है और चाकू की तेज धार वाला हिस्सा दूसरे को दे देता है. इससे पता चलता है कि उस व्यक्ति को दूसरे की तकलीफ और सुविधा की परवाह नहीं. लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया. यही तो साधू का मन होता है जो सारी विपदा खुद झेलकर भी दूसरों को सुख देता है. इसी से पता चलता है कि तुम शिकागो जाने योग्य हो.

आशय यह है की आप दूसरों के प्रति कितने संवेदनशील हैं. क्या आप दूसरों का दर्द देखकर शिहर पड़ते है, गंभीर हादसा, मौते देखकर आप मुंह में निवाला नहीं डाल पाते हैं. बच्चों की किलकारियां तितली और फूल देखकर आपकी सारी थकान छु-मंतर हो जाती है. क्या कभी आप रात या एकांत में विश्व की दुर्दशा पर रोते हैं या नहीं. यदि आप को देशगत समस्याएं नहीं झकझोरती तो समझ लीजिये की आप में कुछ कमी है और आपकी आत्मा मर रही है. इससे पहले वह सम्पूर्ण रूप से मर जाये उसे बचाने का प्रयास शुरू कर दीजियें. नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब सब विनाश के रास्ते ही चल पड़ेंगे और बचाने वाला कोई नहीं होगा.