Saturday, 7 February 2015

भईया! यह उदासी कैसी?


एक आदमी सागर के किनारे टहल रहा था. एकाएक उसकी नजर चांदी की एक छड़ी पर पड़ी, जो बहती-बहती किनारे आ लगी थी. वह खुश हुआ और झटपट छड़ी उठा ली. अब वह छड़ी ले कर टहलने लगा. धूप चढ़ी तो उसका मन सागर में नहाने का हुआ. उसने सोचा, अगर छड़ी को किनारे रखकर नहाऊंगा, तो कोई ले जाएगा. इसलिए वह छड़ी हाथ में ही पकड़ कर नहाने लगा. तभी एक ऊंची लहर आई और तेजी से छड़ी को बहाकर ले गई. वह अफसोस करने लगा. दुखी हो कर तट पर आ बैठा. उधर से एक संत आ रहे थे. उसे उदास देख पूछा, इतने दुखी क्यों हो? उसने बताया, स्वामी जी नहाते हुए मेरी चांदी की छड़ी सागर में बह गई. संत ने हैरानी जताई, छड़ी लेकर नहा रहे थे? वह बोला, क्या करता? किनारे रख कर नहाता, तो कोई ले जा सकता था. लेकिन चांदी की छड़ी ले कर नहाने क्यों आए थे? स्वामी जी ने पूछा. ले कर नहीं आया था, वह तो यहीं पड़ी मिली थी, उसने बताया. सुन कर स्वामी जी हंसने लगे. बोले, जब वह तुम्हारी थी ही नहीं, तो फिर दुख या उदासी कैसी?

आशय यह है की हम संसार में खाली हाथ आते हैं और खाली हाथ ही जाना होगा. सरे ताम-झाम इस संसार के हैं और हम इनमें जितना जकड़ते जाते हैं उतने ही उलझते जाते हैं. यह भी धागे में पड़ी गांठ की तरह है जिसे समय रहते सुलझा लिया गया तो सुलझ जायेगा नहीं तो गांठ कसने के बाद धागे के टूटने के बाद ही गांठ टूटती हैं- यही हाल जीवात्मा का है. जब बालक जन्म लेता है तो उसमें किसी बात का मौह नहीं होता जब वह रोता है तो किसी के उठाने पर वह चुप हो जाता है पर धीरे-धीरे उसका अपने माँ-बाप, भाई-बहन के प्रति मोह बढ़ता जाता हैं और जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है सांसारिक जकड़न में जकड़ता जाता है. दूध के प्रति मोह रखने वाला पानी से भी गल जाने वाले नोट के प्रति मोह रखने लगता है. जितना जकड़ता जाता है उतना ही दुःख और दर्द पाता है. पूर्व जन्म से किसी-किसी को कुछ इच्छित चीजे अनायास मिल जाती हैं नहीं तो कष्ट और श्रम करने पर मिलती हैं. किसी को श्रम करने के बाद भी नहीं मिल पाती. इंसान व्यस्त हो जाता है तमाम ऐसे सुखों की गिनती करने में, जो उसके पास नहीं हैं- आलीशान बंगला, शानदार कार, स्टेटस, पॉवर वगैरह. और भूल जाता है कि एक दिन सब कुछ यूं ही छोड़कर उसे अगले सफर में निकल जाना है. जो यहाँ इकट्ठा किया यहीं रह जाना है साथ सिर्फ नेकनियामते ही जानीं हैं और वही वास्तविक धन  है. पर हम सब लोग उसके प्रति आँखें मूंदे बैठे हैं.


जरुरत आँखे खोलने की है और एक बार अपनी सामर्थ्य और समर्पण से ईश्वररूपी जनता-जनार्दन के आगे नतमस्तक होकर उनकी सेवा में लग जाने की है फिर देखिये जो आतंरिक आनंद मिलेगा उसके आगे सारे आनंद फीके पड़ जायेंगे और इस आनंद का अंतहीन भाव आपमें बढ़ता जायेगा.