Saturday, 28 February 2015

अपने-अपने बदलापुर, अपनी-अपनी कैद...



बदलापुर' एक रोचक फ़िल्म है. बेहद रोचक!... यह दर्शक को भीतर तक झकझोर भी सकती है; बशर्ते उसके मैसेज को ठीक से पकड़ा जाए.

कहानी सिर्फ़ इतनी है कि दो लुटेरे एक बैंक लूट को सफल बनाने की कोशिश में क्षणिक आवेग में आकर एक महिला और उसके बच्चे की गैर-इरादतन हत्या कर देते हैं. उनमें से एक पैसा लेकर फ़रार हो जाता है और दूसरा पुलिस की गिरफ़्त में आने के कारण 20 साल की कैद पाता है. यह दुर्घटना मासूम से दिखने वाले नायक को (जो मारी गई महिला का पति और बच्चे का पिता है) बदल देती है. वह रात-दिन बदले की आग में झुलसता है और लगातार अपनी नफ़रत को ज़िंदा रखता है. पंद्रह सालों बाद उसे पता चलता है कि दूसरा लुटेरा कौन था? वह उसे और उसकी पत्नी को वहशी तरीके से मार डालता है. दूसरा लुटेरा कैंसर हो जाने के कारण तिल-तिल के मरता है. इसी बिंदु पर नायक का बदला पूरा होता है.

पर इस कहानी का मर्म कुछ और है. वह नायक के मन में जमी नफ़रत पर सोचने को मजबूर करती है. नायक कोई अनपढ़ या इतना ग़रीब आदमी नहीं है कि उसे सही परवरिश न मिली हो. वह अंग्रेज़ी पढ़ा-लिखा मध्यवर्गीय युवक है, पर बदले की आग ने उसके सारे नैतिक मूल्यों को ख़ाक कर दिया है. मज़ेदार बात है कि वह 'बदलापुर' नाम के कस्बे में ही रहता है. यह प्रतीक उसकी मनःस्थिति बताने के लिये गढ़ा गया है.

वह बदले की आग में इस कदर पागल है कि एक लुटेरे की प्रेमिका से (जो अपनी मजबूरियों के चलते वेश्या है) वहशियाना तरीके से यौन संबंध बनाता है ताकि उसके प्रेमी को तड़पा सके. जब 15 साल की जेल के बाद इस लुटेरे के कैंसरग्रस्त होने की जानकारी नायक को मिलती है तो वह इस बात को भी सेलिब्रेट करता है. फिर वह दूसरे लुटेरे और उसकी निर्दोष पत्नी का क़त्ल करता है, वह भी काफ़ी परेशान करने के बाद. वह एनजीओ चलाने वाली उस महिला से भी बदला लेता है जो उसे कैंसरग्रस्त अपराधी को माफ़ करने के लिये समझाती है. वह प्यार का नाटक करके उसके शरीर और भावनाओं के साथ खेलता है. शायद वह उसकी बेटी को भी तड़पाना चाहता है, पर वह हॉस्टल में होने के कारण बच जाती है.

शुरू में दर्शक को नायक के प्रति गहरी सहानुभूति होती है क्योंकि उसकी पत्नी और बच्चा बेकसूर होकर भी भयानक तरीके से मारे गए हैं. पर धीरे-धीरे दर्शक उसकी नफ़रत से तादात्म्य स्थापित करने में असमर्थ होता जाता है क्योंकि वह ख़ुद बदला लेने की प्रक्रिया में कई बेकसूरों को निशाना बनाता है. कोई भी मनुष्य अपनी सामान्य समझ से जानता है कि बेकसूर के क़त्ल का जवाब (कसूरवार से जुड़े) किसी बेक़सूर का क़त्ल नहीं हो सकता. युद्ध में सब कुछ जायज़ होने की कहावत चाहे प्रसिद्ध हो, सच यह है कि उसकी भी एक मर्यादा होती है. यही कारण है कि ख़तरनाक से ख़तरनाक गैंगस्टर भी अमूमन अपने दुश्मनों के परिवारों पर हमला नहीं करते..

फ़िल्म के अंत से एक-दो मिनट पहले तक मैं सोच रहा था कि बदले की इस अंधी आग को इतना ग्लोरिफाई करके लेखक/निर्देशक आख़िर क्या मैसेज देना चाह रहा है? हमारा समाज तो वैसे ही इस मानसिकता से परेशान है. कभी तेज़ाबी हमले में, कभी ऑनर किलिंग्स में तो कभी सांप्रदायिक दंगों में यही बदले की आग नए-नए रूपों में सुलगती दिखती है. तो निर्देशक इस आग को और भड़काकर क्या हासिल करना चाहता है?

पर क्लाइमेक्स के बिंदु पर कहानी में टर्निंग पॉइंट आता है और मेरी चिंता दूर होती है. एक लुटेरा, जो बचा हुआ है (और जो असली हत्यारा भी था), नायक द्वारा दूसरे लुटेरे और उसकी बीवी की की गई हत्या का आरोप अपने सिर ले लेता है और फ़िर जेल चला जाता है. ग़ौरतलब है कि कैंसर से पीड़ित इस व्यक्ति की 7-8 महीने की ही ज़िन्दगी बची है और वह इसे भी जेल के नाम कर देता है. उसी जेल के नाम जहाँ से फ़रार होने की दो असफल कोशिशें वह कर चुका था. वह नायक का ज़ुर्म अपने सिर इसलिये लेता है ताकि नायक को बदले की आग और जेल की कैद से मुक्त होकर अपनी ज़िंदगी जीने का एक और मौका मिल सके. वह मौका, जो गरीबी और जहालत से भरी उसकी ज़िन्दगी ने खुद उसे कभी नहीं बख़्शा था...

और फ़िल्म के इन्हीं आख़िरी लम्हों में सब कुछ बदल जाता है. नायक खलनायक बन जाता है और खलनायक के भीतर से नायक उभरता है. यूँ, दोनों ही एक-दूसरे के हाथों हुए कत्लों की सज़ाएँ भुगतते हैं; पर खलनायक इस लेन-देन को जिस औदात्य और ज़िंदादिली के साथ निभाता है, उससे उसे नायकोचित महानता हासिल होती है; और नायक उसके बड़प्पन के सामने बौना साबित होता है. नायकत्व और खलनायकत्व की ऐसी घुलनशीलता नवलेखन और परवर्ती दौर के हिंदी नाटकों और उपन्यासों में तो दिखती रही है, पर हिंदी सिनेमा में यह एक मौलिक उपलब्धि है. इसके लिये निस्संदेह लेखक-सह-निर्देशक श्रीराम राघवन को बधाई दी जानी चाहिये.

फ़िल्म तो अचानक इस झटके के साथ ख़त्म हो गई; पर उसने मजबूर किया कि इसके अर्थ का विस्तार जीवन तक करके देखा जाए. और फ़िर साफ़ नज़र आया कि हम सब अपने-अपने बदलापुर के कैदी हैं. हम सबकी अपनी-अपनी हिट लिस्ट है और हम सारी ज़िंदगी कुछ नफरतों को निभाने में निकाल देते हैं. कहीं हिंदू-मुसलमान के नाम पर; तो कहीं शिया-सुन्नी, यहूदी-मुसलमान, श्वेत-अश्वेत या खानदानी और व्यावसायिक नफ़रतों के नाम पर. और इन नफ़रतों को निभाने के चक्कर में ज़िंदगी हाथ से फिसल जाती है. ज़िंदगी, जो एक ही बार मिली है और जिसे बेहतर तरीके से जिया जा सकता है...

एक मौजूँ सा अर्थ यह भी छिटका कि 'पढ़े लिखे' और 'समझदार' को समानार्थी मानना ग़लत है. 'पढ़ा लिखा' नायक 15 सालों में भी अपनी नफ़रत को नहीं संभाल सका जबकि एक अनपढ़ से खलनायक ने बहुत जल्दी और करीने से अपनी नफरत को हरा दिया. समझदारी का सम्बन्ध अक्षर ज्ञान या डिग्रियों से नहीं होता, एक सुलझे हुए दिमाग से होता है. यही कारण है कि कबीर जैसा अनपढ़ आज तक के सभी डिग्रीधारियों पर भारी पड़ता रहा है जबकि पढ़ाई से इंजीनियर होते हुए भी ओसामा-बिन-लादेन दुनिया को नफ़रत का पैगाम ही दे पाया.

निचोड़ यह कि फ़िल्म देखने लायक है. नवाज़ुद्दीन सिद्दिकी और विनय पाठक का अभिनय तो अच्छा है ही; वरुण धवन, हुमा कुरैशी और दिव्या दत्ता ने भी ठीक से निभाया है. फ़िल्म दर्शक को बांधकर रखने में सफ़ल रही है और अंतिम क्षणों में वह उसे चौंकाकर एक कायदे की बात सिखा देती है. वही बात जो बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह और महात्मा गांधी भी समझाकर गए हैं कि नफ़रत की आग में जलने से बेहतर है क्षमा करके अतीत की पीड़ा से मुक्त हो जाना. गांधी जी ने कहा था कि 'आँख के बदले आँख' का नियम सारी दुनिया को अंधा बना देगा. होना तो यह चाहिये कि जो तुम्हारा बुरा करे, तुम उसका भी अच्छा करो. रहीम की भाषा में कहें तो 'जो तोकू काँटा बुवै, बोऊ ताहि तू फूल'. सनद रहे कि प्रतिशोध की ताक़त होने पर भी माफ़ कर देना कमज़ोरों का नहीं, वीरों का लक्षण है. क्षमा वीरस्य भूषणं...


('बदलापुर' फ़िल्म पर एक छोटी सी टिप्पणी)