Tuesday, 23 December 2014

किसान दिवस पर धरती-पुत्रों को सलाम

किसान मसीहा एवं देश के पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के जन्मदिवस 23 दिसम्बर को “किसान दिवस” के रुप में मनाया जाता है. पूर्व प्रधानमंत्री किसानों के हितैषी थे और उनकी नीति किसानों व गरीबों को ऊपर उठाने की थी. उन्होंने हरदम यह बताने का प्रयास किया कि बगैर किसानों को खुशहाल किए देश व प्रदेश का विकास नहीं हो सकता. उन्होंने समस्त उत्तर प्रदेश में भ्रमण करते हुए कृषकों की समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया. उत्तर प्रदेश के किसान चरण सिंह को अपना मसीहा मानने लगे थे. कृषकों के बीच सम्मान होने के कारण इन्हें किसी भी चुनाव में हार का मुख नहीं देखना पड़ा.
मैं जब बचपन में किसान के बारे में पढ़ता था तो यह समझ पाया था कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और भारत के गाँवों में देश की शान ‘किसान’ निवास करते हैं जो हिंदुस्तान का पेट भरता है. किसान अगर नहीं होगा तो इस देश में कुछ नहीं होगा. देश के दूसरे प्रधानमंत्री शास्त्री जी का नारा भी इसी बात को दोहराता था- " जय जवान- जय किसान " . पर अब जब मैं अख़बार, टीवी, रेडियो सुनाता हूँ तो मुझे इनकी हतासा, निराशा और आत्महत्या की खबर ही सुनने को मिलती है. बहुत कम लोग होंगे जिन्हें किसान दिवस के बारे में पता होगा. मैंने आज के अख़बार देखे पर किसी में इसका जिक्र नहीं था और रहा भी होगा तो हासिये पर जहाँ तक मेरी नजर नहीं पहुच सकी. यह बाजारवादी संस्कृति है जिसमें हम न्यू इअर, बेलिनटाइन डे, वीमेन डे, मदर डे, फादर डे, जैसे कितने दिवस अख़बारों और समाचारों के लिए महत्पूर्ण होते हैं. किन्तु "किसान दिवस " के बारे में यह मौन हैं क्योंकि इनकों स्पोंसर करने वाला कोई नहीं है.
 
यदि आंकड़ों की बात करे तो भारत विश्व का चौथा बड़ा कृषि उत्पादक राष्ट्र है और यहाँ करीब 180 मिलियन हेक्टेयर कृषि रकबा है और इसके 140 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र पर लगातार खेती होती है. 2011 के आंकड़ों के अनुसार औसत खेती 1.5 हेक्टेयर है. यहां 638,588 गांव हैं जिसमे 83 करोड़ से अधिक आबादी बसती है. किसान परंपरागत खेती के अतिरिक्त यांत्रिक विधि से भी खेती कर रहे हैं. खेत का रकबा कम होने तथा ग्रामों में रोजगार ना होने के चलते अधिकतर युवा और मौसमी कामगार रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ रुख कर लेते हैं.
जब भारत आजाद हुआ था तो देश की 84 प्रतिशत आबादी गांवों में और 16 फीसदी आबादी शहरों में निवास करती थी किंतु आज शहरी क्षेत्र में निवास करने वालों की संख्या बढ़कर 31.16 प्रतिशत व ग्रामवासियों की संख्या 68.84 प्रतिशत हो गई है.

आज देश में किसानों की जो स्थिति है वह जगजाहिर है. किसान गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर है. देश का हर दूसरा किसान कर्ज में डूबा हुआ है. हालात कुछ ऐसे हैं कि हर किसान पर औसतन लगभग 47 हजार रुपये कर्ज है. सबसे खराब स्थिति महाराष्ट्र और आन्ध्र प्रदेश की है जहां 90 फीसद से अधिक किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं. खेती की खराब माली हालत के चलते किसान मनरेगा और बीपीएल कार्ड के सहारे गुजारा कर रहे हैं.

व्यापारी आलू से लेकर लीची तक गाँव से औने पौने दाम में ले जाते हैं और फिर चिप्स, शराब, जूस आदि के रूप में मंहगी कीमत पर देश को बेचते हैं. यह हमारे आर्थिक नीति-निर्माताओं के लिए दशकों पहले सोचने का विषय होना चाहिए था कि हमारे किसान,जो देश को खिला-पिला कर तंदुरुस्त रखते हैं, वो अपने खेतों में हल नहीं चला पा रहे हैं और शराब जैसी गैर जरूरी चीज़ बनाने वाले लोग हवाई जहाज चला रहे हैं.

विश्व भर के समाचारों से पत्र, टेलीविजन, अखबार भरे पड़े रहते हैं पर किसान की ख़बरों को इसमें स्थान नहीं मिल पाता और ग्रामीण पत्रकारिता को दोयम दर्जे के पत्रकारों पर छोड़ दिया जाता है. देश के लिए, जी-तोड़ कर मेहनत कर अन्न उत्पन्न करने वाला किसान आज अन्न के एक-एक दाने के लिए मोहताज हो रहा है. कुछ राज्यों के किसानों को छोड़ दिया जाए तो किसानों स्थिति बहुत खराब एवं दयनीय है. आज कहीं सूखा पड़ने से किसान मर रहा है तो कहीं ज्यादा बारिस किसान को बर्बाद कर रही रही है, कभी बाढ़, कभी ओलावृष्टि किसानों को खुदखुशी करने पर मजबूर करती है, कहीं अत्यधिक कर्ज किसानों की जान ले रहा है.
 
हमारी सरकार किसानों के लिए कितना कर रही है? सरकार की ढेर सारी योजनाओं का कितना फायदा किसानों को मिलता है? ये बात हम सब से छुपी नहीं है. जहाँ किसान एक-एक पैसे के लिए दर दर भटक रहा है, वहीँ इस देश में कुछ नेता अपनी प्रतिमा लगवाने में पैसे का दुरूपयोग कर रहे हैं. कहीं कोई नेता सिर्फ नाम के लिए अरबों रूपए शादी के नाम पर खर्च कर रहा है, कहीं कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा है तो कोई कालाधन वापस लाने के लिए सरकार पर दबाव डाल रहा है. सिर्फ एक दुसरे की टांग खिचाई में ही लगे हुए हैं. एक तरफ देश के कई मंत्री मंहगाई भत्ता, और अपने फायदे के लिए कितने तरह के विधेयक संसद में पास करवा लेते हैं. इसके बिपरीत किसान अपनी फसलों का उचित मूल्य भी नहीं प्राप्त कर पाते, उन्हें अपनी फसलों के उचित मूल्य के लिए भी सरकार के सामने अपनी एडियाँ तक रगड़नी पड़ती हैं.

सरकार और किसान इस बात को समझे कि भारतीय किसान की दशा केवल खेती से नहीं सुधर सकती. खेती का काम बारहों महीनें नहीं रहता. अंत: गाँव में छोटे-मोटे उद्योग-धंधे भी स्थापित करने चाहिए, जिनमे खेतों के औजार विशेष रूप से बनने चाहिए. यातायात की सुविधा गाँवों को मिलनी चाहिए, जिससे वह अपना अनाज बड़ी मंडियों में बेच सके और बनियों के शोषण से बच सके.
अंत में मैथिलीशरण गुप्त की कविता की कुछ पंक्तिया-
 
“हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा,  थरथराता गात है
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

खुद भूखा रहकर हम लोगों की भूख मिटाने वाला किसान हमारा अन्नदाता है. अतः किसानों को भी एक अच्छी जिंदगी जीने का हक मिलना चाहिए. " किसान -दिवस " पर देश के समस्त किसानों को मेरा शत-शत नमन!