Tuesday, 23 December 2014

महंगाई डायन खाय जात है!

 
 
गाँव प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली है और उसके बिना सारे विकास अधूरे हैं. गाँव वह जगह है जहाँ प्रकृति मनुष्य को सीने से लगाकर उसका दुलार करती है, भोजन देकर उसे पुष्ट बनाती है, और फिर अपनी गोद (हरी-हरी घास) में सुलाकर हवा की लोरी सुनाती है. सुबह की ठंडी हवा और रात को दूर किसी हरे खेत के ऊपर सूरज का डूबना, नहरों का पानी, पक्षियों की किलकारी, पशुओं का स्नेह, हरे-भरे लहलहाते खेत, लोगों का आपसी प्यार, बच्चों का खुल कर खेलना यह कितना सुखद, शांत और मनोरम है इसे वे शहरी लोग क्या समझे जो कभी तारों से भरे आकाश के नीचे नहीं सोये, बिना वाहन कही नहीं जाते, बिना मतलब किसी से बात नहीं करते, आउटडोर गेम से ज्यादा इनडोर खेल ज्यादा पसंद करते हैं, उचल-कूद नहीं करते और सबसे बड़ी बात चारों तरफ से घिरी इमारतों के बीच रहते है और अधिकांश में तो सूर्य देवता के दर्शन भी दुर्लभ होते हैं. भोजन के लिए अनाज से लेकर फूल,फल और औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ भी सब गाँव से ही हमें प्राप्त होते थे. गाँव के बिना किसी भी देश का पेट नहीं भर सकता और बिना इसके सारा ताम-झाम ही बेमानी है.
 
गाँव में पक्की सड़क आज भी नहीं है, चकरोड है पर गाँव की मिट्टी कल भी सोना उगलती थी और उसमे वह शक्ति आज भी है. मुझे याद है की माँ पेड़ के नीचे, छप्पर के किनारे, और घर से गुजरते हुए चकरोड के किनारे टमाटर,धनिया, नेनुआ, तोरई, कद्दू, लौकी, कुनरू और हरी प्याज, मिर्च बो देती थीं और हम उसमे पानी डालते थे. देखते-ही-देखते जमींन  से लेकर पेड़ और छप्पर तक हरी सब्जी फलने लगती थी. मेरे पापा और चाचा दादा जी के साथ खेतों में आलू, प्याज, भिन्डी, टमाटर, मूली, पालक, गोभी आदि बोते थे और इतनी सब्जी होती थी की आस-पड़ोस में बाटने के बाद भी बच जाती थी. पशुओं को भी हरे-चारे की व्यवस्था हो जाती थी. लौकी और कद्दू तो रोज टूटते थे और कभी बुआ के यहाँ तो कभी फुआ के यहाँ जाते रहते थे. मां, दादी, बुआ के हाथों लगी सब्जियां काफी फलती थी लोग कहते थे कि तुम्हारी मां, बुआ के हाथ में जादू है, कोई भी सब्जी लगा देती हैं बरकत ही होता है.
 
उस समय गाँव में कोई ट्रैक्टर नहीं था बैल से खेती होती थी. पिताजी, बड़े पिताजी, दादा को बिना खेत में काम किये चैन नहीं पड़ता था. सब चाहे जाड़ा हो, गर्मी हो या बरसात सुबह से ही खेत में लग जाते थे और हम भी पीछे-पीछे चल पड़ते थे और खेतों के कोन (खेत के चारों तरफ छूटा हिस्सा) गोड़ते थे. करीब आठ बजे तक हम लोग खेत में रहते और पिताजी या बड़े-पिताजी के आने के बाद हम घर आकर दही,मट्ठा रोटी खा कर हम पढ़ने के लिए भाग जाते थे. शाम को स्कूल से लौटकर फिर खेतों में जुट जाते. गाय-भैंस का दूध निकालने और उन्हें चारा खिलाने-पिलाने के बाद लालटेन की रोशनी में पढ़ाई होती थी. मुझे धान, गेहूं के बजाय सब्जियों के खेती अच्छी लगती थी जैसे-लाल-लाल गुच्छे में फले टमाटर, क्यारियों में लगे गोभी, पत्ता-गोभी, आलू, प्याज, लहसून, धनिया की खेती.
 
लेकिन आज हालत बदल गए हैं खेत, गांव और चकरोड वही हैं परन्तु लोगों की सोच, कुए की जगह हैंडपंप का पानी,  बाजार पर निर्भरता,  ट्रैक्टर,  ट्यूबेल, डीजल हल, थ्रेसर होने के बावजूद एक जून की सब्जी उगाने में परेशानी हो जाती है तर्क और दिखावे के फालतू बुशर्ट और जीन्स की पैंट के साथ हाथ में मोबाइल लिए गांव में घुमते-मिलते हैं कुछ नौजवानों के लिए खेती करना सम्मान का विषय नहीं रह गया तो कुछ नौजवान और मजदूर शहरों की ओर पलायन कर गए हैं. खेती के लिए अब मजदूर नहीं मिलते,क्योंकि शहर जितनी नगद मजदूरी मजदूरों को देता है, बेचारे किसान नहीं दे सकते. लेकिन यह भी सच है कि ज्यादा पैसे के लालच में मजदूर शहर में नारकीय जीवन जी रहे हैं. पलायन की वजह से बढ़ी भीड़ ने शहर की खूबसूरती और चमक-दमक दोनों को ध्वस्त किया है. सड़कों पर जाम की स्थिति हो या नागरिक सुविधाओं की बात हो, हर जगह भीड़ ने कचरा किया है. भ्रष्टाचार को बढ़ाने में भी पलायन की ज़बरदस्त भूमिका रही है. व्यक्ति पैसों से आँका जाने लगा है और किसानों के पास पैसा नहीं हैं.ग्रामीण परंपरा, गाँव, बोली, काम, पहनावा, आचार-विचार और व्यव्हार सब पिछड़ेपन का पर्याय बन गया है.  हमारा इंडिया आगे बढ़ता जा रहा है, रोज़ तरक्की की अनगिनत सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है, मगर भारत रोज़ पिछड़ता जा रहा है.
यह बात मैं यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि महंगाई को लेकर खूब चिल्ल-पो हो रही है- सरकार को गाली देने का फैशन सा बन गया है. समस्या है कि सब बाजारू हो गए हैं. शहर तो बाजार पर निर्भर ही था परन्तु अब साग-सब्जियों के लिए गाँव भी बाजार के भरोसे जीने लगा है. तर्क के रूप में कहते हैं कि जितनी लागत में सब्जियां ऊगाओ उतने में बाजार से सब्जियां मिल जाती उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि क्या वे उतनी ताज़ी हो सकती हैं जितनी खेत की होती हैं. सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं ऐसे में सरकार तो सब्जी उत्पादन करने से रही. यह तो सिर्फ किसान ही कर सकता है और सरकार सिर्फ बाजार की रूकावटे दूर कर सकती है. अब समस्या यह हो  रही है कि अगर सब बाजार से ही खरीदने लगे तो सारे किसान बाजार पर निर्भर हो जायेंगे और फिर बाजार में सब्जी कहाँ से आयेगी? अगर लागत के बराबर भी उपज हो रही है तो क्या हर्ज है? कम से कम-से-कम ताज़ी सब्जियां तो मिल जाएँगी और इससे बाजार में मांग नहीं बढ़ेगी और जब मांग नहीं बढ़ेंगी तो महंगाई कहां से बढ़ेगी?