Thursday, 19 February 2015

कहीं भोजन ही जहर न बन जाय

मनुष्य को भोजन से उर्जा मिलती है और उसी उर्जा की सहायता से मनुष्य जीवन की सारी गतिविधियों को संचालित करता है. संतुलित भोजन से उसका स्वास्थ्य लाभ बना रहता है और वह बिमारियों से भी बचा रहता है. पर समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब भोजन ही विष बन जाय और उसे खाकर मनुष्य बीमार पड़ने लगे. ऐसे में किया भी क्या जा सकता है क्योंकि बिन भोजन के जिन्दा नहीं रहा जा सकता और जिन्दा रहने के लिए खाना जरूरी है.

आज खेतों में जिस तरह रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग हो रहा है और भूमिगत जल और नदियाँ प्रदूषित हो रहीं है उससे यह आशा कम ही हो जाती हैं की हरी और ताजी दिखने वाली सब्जी या अनाज खाकर  हमें उचित पोषण मिलेगा बहुत संभव है की वह हमें बीमार बना दें.
साधारण मनुष्य पहले तो खाने के लिए परेशान है उसके बाद खा के हो रही गंभीर बिमारियों से भी परेशान होना शुरू हो चूका है. उसका तो कंगाली में आटा गिला हो रहा है. वह न खाना खाकर स्वस्थ्य रह सकता है और न ही बीमार पड़ने पर फल खाकर ठीक हो सकता है.
इसी बात की पुष्टि खाद्यानों पर कीटनाशकों के प्रभाव को जानने के लिए किये गए "स्वास्थ्य और कोडेक्स मंत्रालय के अधीन भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (FSSAI) के तहत निर्धारित रूप में 16,790 नमूनों में से कुल 509 नमूने अधिकतम अवशेषी सीमा (MRL) के ऊपर पाए गए. जिसमें सब्जियों, फल, मसाले, चावल, गेहूं और अन्य खाद्य वस्तुओं नमूनों को शामिल किया गया था. MRL बरसात के मौसम में उगाई गयी सब्जियों में गर्मियों और सर्दियों की अपेक्षा अधिक पाया गया है. अध्ययन में यह बात भी उभर कर आई कि मांस, दूध और सतही जल नमूने  अधिकतम अवशेषी  सीमा (MRL) से निचे पाए गए हैं.
नमूनों को देश के विभिन्न भागों में स्थित विभिन्न थोक और खुदरा बाजार से एकत्र किया गया था और उन्हें 25 प्रयोगशालाओं में जांचने के बाद रिपोर्ट तैयार की गयी है.
रिपोर्ट के अनुसार, 7591 सब्जियों के नमूनों में से 221 नमूनों में MRL से ऊपर कीटनाशकों के अवशेष पाए गए. जिनमें पत्तागोभी, बैंगन, टमाटर, भिंडी, करेला, खीरा, हरी मटर और धनिया पत्तियों की अपेक्षा शिमला मिर्च, हरी मिर्च और गोभी के नमूनों में MRL अवशेषों से ऊपर की उच्च संख्या पाई गयी. वह कीटनाशक जो सामान्यतः नमूनों में MRL से ऊपर पाया गया Chlorpyrifos, ethion, acetamiprid, dichlorvos और cypermethrin थे.

फल के मामले में 2235 में से 36 नमूनों में MRL उच्च स्तर पर था जिसमें अंगूर में यह सबसे उच्च था. 1161 मसालों के नमूने में से, 128 नमूने में MRL उच्च था जिसमें इलायची में अवशेषों निहित की उच्च संख्या के ऊपर कीटनाशक पाए गए जिनमें मुख्य रूप से quinalphos, cyhalothrin-L, profenofos, bifenthrin, triazophos और cypermethrin थे.
अनाज में 886 चावल के नमूने से 73 नमूने, 823 गेहूं के नमूने से 39 नमूने  साथ ही 776 मछली नमूनों में से छह नमूनों में कीटनाशक स्तर MRL से ऊपर पाए गए. चाय और दालों में भी कीटनाशकों का स्तर MRL स्तर से ऊपर था.
सरकार इस विषय में संज्ञान नहीं ले रही है और दिल्ली में यमुना किनारे सब्जियां उगाई जा रही हैं जिसमें यमुना का विषैला पानी डाला जा रहा है. तमाम नदियों से नहरें निकल रहीं हैं और उनसे ही कृषि का एक बड़ा भू-भाग सिंचित हो रहा है. देश की मुख्य नदियों की हालत किसी भारतवासी से छुपी नहीं है. दिल्ली, नोइडा जैसे शहरों का जल स्तर भी प्रदूषित हो चूका है. किसान भी ज्यादा उत्पादन के लालच में उर्वरक के सहारे की कृषि कर्म में जुटे हुए हैं और उन्होंने कम्पोस्ट और हरी खाद को तो जैसे भूला ही दिया है. एक तरफ इससे जहाँ भू-प्रदुषण बढ़ रहा है वहीँ दूसरी तरफ लगातार दुधारू पशुओं की संख्या भी जनसंख्या के अनुपात में घटती जा रही है. जो लोग जैविक या जीरो बजट खेती कर रहें हैं उन्हें उचित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा. उन्हें अपने कृषि उत्पाद भी साधारण उत्पादों के साथ बेचने पढ़ रहे हैं. सरकार सिर्फ उत्पादन पर ध्यान दे रही है उसकी गुणवत्ता पर कोई जोर नहीं दे रही है.
यदि यह सब ऐसा ही चलता रहा तो लोग भोजन पाने के बाद भी मरने लगेंगे और हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पायेंगें. ऐसी स्थिति उत्पन्न हो उसके पहले ही हमें चेत जाना चाहिए और उर्वरकों का प्रयोग कम कर जैविक खेती की तरफ कदम बढ़ा देने चाहिए.