Sunday, 7 June 2015

देवभूमि और हमारी फितरत

Think About India


इंसानियत नामक चिड़ियाँ रेड डाटा बुक में लिस्टेड हो गयी है, संवेदना नामक कीड़ा शरीर से उसी तरह गायब हो रहा है जैसे क्रोसिन लेने के बाद शरीर का दर्द, सेवाभाव आउटडेटिड फैशन हो गया है. ‘आपना काम बनता भाड़ में जाय जनता’ जुमला चलन में  है. लाशें कमाई का जरिया बन रही है. आपदा, सुनामी, भूकंप आने पर सम्बंधित स्थान महत्पूर्ण लोगों के लिए पर्यटन स्थल बन जाता है. महत्पूर्ण आदमी नंगे, भूखे-प्यासे, चिलचिलाती धुप से बचते, मौत से जूझते, अपनों को खोजते लोगों के हवाई मार्ग से दरसन कर तात्कालिक स्थिति का संज्ञान लेते हैं. राहत कार्यों में देरी होती है तो हो, राहत कार्य के लिए हेलीकाप्टर और संसाधनों का अभाव रहे फिर भी माननीय हवाई मार्ग से सम्पूर्ण संसाधन के साथ उन्हें तड़फता देख ही आते हैं.

लोगों के लिए नई पर प्रवृत्ति विशेषज्ञों के लिए पुरानी खबर आरटीआई के जरिए मिली है की उतराखंड आपदा-2013 के समय देवभूमि में खूब पिकनिक मनी है, मटन, पनीर और रसगुल्ले उड़े हैं. बेफालतू लोग शोर मचाते है, ब्लडी इंडियन, ब्लैक एंड ब्राउन पीपल ये भी नहीं समझते की अपना काम खुद करना पड़ता है. आपको चोट लगी है तो डॉक्टर ढूढ़ों, आपका पैर जख्मी है तो रेंग के जाओ, आपका बच्चा लापता है तो गुमसुदी दर्ज करवाओं पर व्यर्थ शोर मत मचाओ. आपकी तो भगवान ने नहीं सुनी फिर इन्सान क्या सुनेगा. भगवान ने दंड दिया है तो सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी. इन्सान कौन होता है भगवान और उसके दंड के बीच में आने वाला.
हमारी रूह तो संसारिकता से मुक्त है, वह जानती है की सब माया है, दुःख-दर्द तो वास्तविक है ही नहीं, सब आभासी हैं. फिर विकट त्रासदी में, रोते- बिलखते लोगों, बच्चों-औरतों की लाशों, बेवाओं के आसूं और अपने की तलाश में पथरा गयी आँखों को देखकर विचलित होने का सवाल ही कहाँ? कहते हैं-'पहले पेट पूजा फिर काम दूजा'- वही तो हुआ  है फिर आरटीआई और सीबीआई क्यों? और क्या होगा इनसे? न्याय...क्या कहाँ?....क्या यह शब्द अभी जिन्दा है?...इससे तो बजरंगी भाईजान अकेले ही निपट लेंगे. आज तक जांच  एजेंसियों से कुछ हासिल हुआ है..मात्र शोर-सराबा होने के. कुछ भी हो लोग आज भी विश्वासी हैं- यही सबसे बड़ा अपने आप में आश्चर्य है.

हमारा थोड़े ही था कोई वहां. फिर बेमतलब हम क्यों कष्ट सहें. मज़बूरी थी जाना पड़ा तो हम भूखे क्यों मरें. हम क्यों दूसरों के दुःख में दुखी हों. लोग तो वैसे ही मर रहे थे, दर्द  से कराह रहे थे, भूखे थे, प्यासे थे, शिविर कैम्प में थे. फिर हम आलीशान होटल का मजा क्यों न लें. वैसे भी लोग कहते हैं- “जाके पैर ना फटी बिवाई, का जाने उ पीर पराई.” यह हो भी क्यों नहीं जब सेनापति गड़बड़ हो तो सेना भी टके सेर खाझा, टके सेर भाजी जैसी ही होगी अथार्त यथा राजा तथा प्रजा. कुछ लोग तो अभी तक इसी मलाल में थे की राहत सामग्री हाथ नहीं लगी, जवानों की गिद्ध आँखे उनपर लगी रही, नहीं तो वह भी बिक सकता था, मदद के नाम पर भी पैसे बनाए जा सकते थे, अस्थाई व्यवस्थाओं से उगाही की जा सकती थी. गरीब लोगों की आबादी कम की जा सकती थी, उन्हें भूखे-प्यासे या इलाज के अभाव में मारा जा सकता था. पर देश के जवानों के उत्कट परिश्रम से मंसूबों पर पानी फिर गया.

आखिर भाई, यह देवभूमि थी, कोई देवलोक नहीं, यहाँ तो ताबूत तक से पैसे बनते हैं, जानवरों का चारा छीन लिया जाता है, बोफोर्स मगाई जाती है, 2G बिकवाली होती है, चिटफण्ड चलाये जाते हैं, कोयला आवंटन होता है, कॉमनवेल्थ गेम होता है. इन सबसे स्विस बैंक और मारीसस में सम्पन्नता आ रही है कितनी खुशी की बात है. पर आप लोग दूसरे की खुशी में खुशी नहीं हो सकते आपको तो एक औरत (जयललिता) को जेल भेजकर, राजू का मंत्रीपद छुड़ाकर खुशी मिलती है. सल्लू भाई की गाड़ी के नीचे आकर आपको चैन पड़ता है. तभी अभिजीत आपको गालियाँ देता है और प्रशासन उन्हें सुरक्षा. अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की भूमि कौन सी है काम तो फितरत के हिसाब से ही होता है.


साँप जाने के बाद लकीर पर लाठी पिटते रहो. यह आपकी खुशी है की सीबीआई बैठाओ या एफबीआई पर फितरत बदलने वाली नहीं, हमाम में तो सब नंघे है. फिर अब तो सच भी गुमनाम रास्ते जाकर भटक गया है इतनी जल्दी वह सही रास्ता पाने वाला नहीं.