Tuesday, 23 December 2014

अच्छे दिन कब आएंगे?

लोगों ने कांग्रेस को मंहगाई और भ्रष्टाचार के चलते इस आस में हटाया की मोदी जी अच्छे दिन लायेंगे और उनकी सब नहीं तो कम से कम जरूरी और महत्पूर्ण हक जरूर पुरे होंगें. इसी के चलते मतदाता ने मोदी जी को सरकार चलाने एवं पार्टी के संसद सदस्यों को देश चलाने का जनादेश दिया. लोगो को बिस्मिल की इस शायरी पर भरोसा था कि-
“मादरे-हिन्द गमगीन न हो अच्छे दिन आने वाले हैं
आज़ादी का पैगाम तुझे हम जल्द सुनाने वाले हैं

माँ तुझको जिन जल्लादों ने दी है तकलीफ़ जईफ़ी में
मायूस न हो मगरूरों को हम मजा चखाने वाले हैं”
पर इस समय देश और संसद में जो कुछ हो रहा हो उसे देश चलाने का काम तो नहीं कहा जा सकता.
बडबोलापन के कारण अटके विधेयक
भाजपा के सांसद और नेता समय-समय पर राष्ट्र के नाम संदेश के जरिये विपक्ष को मुद्दा देते रहते हैं. साध्वी निरंजन ज्योति, गिरिराज सिंह, योगी आदित्यनाथ, स्वामी साक्षी महाराज के बडबोल से संसद में आये दिन हंगामे हो रहे हैं और महत्पूर्ण बीमा अधिनियम (संशोधन), कोयला खदान (विशेष प्रावधान) विधेयक, कंपनी कानून (संशोधन) बिल लटके पड़े हैं. राजनीतिक दलों ने मान लिया है कि बिना रुकावट के संसद की कार्यवाही चलना सरकार की जीत है और विपक्ष की हार है. इसलिए विपक्षी दल संसद में नहीं हारना चाहते. सत्ता पक्ष और विपक्ष की जीत हार के इस खेल में आम देशवासी रोज हार रहा है.
नक्शलवाद का संकट  
नक्शलवाद भी घात लगाकर हमारे अर्धसैनिक बलों कों जब चाहे गोलियों से भून डालता है. हम उसकी जड़ पर आज भी चोट नहीं कर पा रहे हैं. यही कारण है की वह ख़त्म होने के बजाय बढ़ रहा है.
आम आदमी है हतास
आम-आदमी के जीवन में कोई सुधार होता नहीं दिख रहा है. बेघर लोगों की ठण्ड से मरने की खबरे आनी शुरू हो गयी है. रोजगार, नारी-सुरक्षा बढ़ने के बजाय गिरता हुआ दिख रहा है, बच्चियां अभी भी स्कूल छोड़ रही हैं और उनका कम उम्र में विवाह हो रहा हैं. किसान और मजदूर वर्ग टकटकी लगाये सरकार की तरफ देख रहे है पर निराशा ही हाथ लग रही है. पुलिस, आईआरटीओ, कस्टम और रिवेन्यू से आज भी लोग दो-चार हो रहे हैं, किसी की एफआईआर नहीं लिखी जा रही है तो किसी का ड्राविंग लाइसेंस नहीं बन रहा तो किसी का सारे कागजात होने के बाद भी माल कस्टम के कारण पोर्ट पर पड़ा है. महंगाई सुरसा की तरह मुह फाड़े सामने खड़ी है. मंहगाई दर न्यून है पर आज भी दाल 100 रु.पर बना हुआ है.
गरीबी
योजना आयोग के मुताबिक देश में गरीबी कम हो रही है जबकि विश्व बैंक ने भारत में गरीबी के बारे जो आंकड़े पेश किए हैं, वे आंखें खोलने वाले हैं. गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी के प्रतिशत के लिहाज से भारत की स्थिति केवल अफ्रीका के सब-सहारा देशों से ही बेहतर है. विश्व के कुल गरीब लोगों में से 33 प्रतिशत  सिर्फ भारत में ही रहते  हैं. भारत में गरीब सिर्फ चुनाव के समय याद किये जाते हैं उसके बाद भगवान के सहारे छोड़ दिए जाते हैं और वह अपने छोटे-छोटे कामों और दो वक्त की रोटी के लिए दर दर भटकता रहता है. तीन चार साल के अन्दर के अन्दर चीजो के दाम आसमान छूने लगे है, हर चीज में पचास से सौ दो सौ प्रतिशत तक मूल्य वृध्दि हो चुकी है (केवल किसानों  की उपज और मजदूरों की मजदूरी छोड़ कर). आम आदमी की हालत लगातार खराब होती जा रही है. सरकारी विभागों में लाल फीताशाही, चमचागिरी हावी है. नरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार भी किसी से छुपा नहीं है.
अर्थव्यवस्था
उद्योग वर्ग के साथ-साथ मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्योग भी खुश नहीं हैं. जहां मुद्रास्फीति लगातार गिरावट की शिकार है और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक नवंबर में रिकॉर्ड 4.38 फीसदी पर रहा, वहीं अक्टूबर में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में 4.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. व्यापार घाटा 18 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है और जीडीपी 5.7 प्रतिशत से गिरकर 5.3 पर आ गई है. वह भी तब जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम लुढ़क गए हैं. रुपया 63.59 का आंकड़ा पार कर चूका है. करदाताओं की  परेशानियां समाप्त नहीं हो रहीं, न्यूतनम सरकार के साथ अधिकतम प्रशासन देने भी नहीं दिख रहा है, विकास दर कछुए की चाल चल रहा है.
काला धन
काला धन बिना किसी देरी के वापस लाने की कही गई थी. लेकिन पहले यह विषय चुनाव का तो अब समाचार का मुद्दा बन कर रह गया है. अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंक द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने साल 2003 से साल2012 तक 539.59 बिलियन डॉलर (28 लाख करोड़) का काला धन देश से बाहर भेजा है. यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि काला धन कब वापस आएगा?
आतंकवाद 
आतंकवाद वैश्विक स्तर पर काफी खतरनाक रुख अख्तियार कर चूका है. सिडनी के कैफे और फिर पेशावर का नरसंहार उसकी कहानी कहता है. ऐसे में भारतीय युवकों का दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आइएस) से जुड़ने का मामला काफी चिंता का विषय है.
 
 भारतीय रेलवे
भारतीय रेलवे की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है. वस्तुओं की ढुलाई के मामले में यह लगातार सड़क परिवहन के हाथों अपनी बाजार हिस्सेदारी गंवा रहा है और समय पर अपनी सेवाएं मुहैया कराने, रेलगाडिय़ों और रेलवे स्टेशन को साफ रखने के बुनियादी काम को करने में वह नाकाम हो रहा है. प्रीमियम तत्काल बुकिंग में जो लोग ज्यादा पैसे देने में समर्थ हैं और जिन्हें इंटरनेट सेवा मौजूद है, उन्हें तो आसानी से रिजर्वेशन मिल जाता है जबकि जिनके पास यह सुविधा नहीं है, उन्हें आरक्षित बर्थ नहीं मिल पाती है. इससे असमानता को बढ़ावा दिया जा रहा है.
इंसपेक्टर राज
करीब 44 से अधिक केंद्रीय श्रम कानून और करीब 10 राज्यों के कानून फैक्टरियों के मुख्य निरीक्षकों, श्रम निरीक्षकों, न्यूनतम वेतन निरीक्षकों, सतर्कता निरीक्षकों और स्वास्थ्य एवं सुरक्षा निरीक्षकों की व्यवस्था है. वे किसी भी कार्यालय, प्रतिष्ठान, फैक्टरी अथवा अन्य परिसर में घुस सकते हैं और उनसे परीक्षण के लिए संबंधित दस्तावेज मांग सकते हैं. अगर आप इस प्रक्रिया का पालन करने में चूक गए तो आपको निरीक्षक को अच्छी खासी रिश्वत देनी होगी. मोदी ने कंपनियों को स्वप्रमाणन की सुविधा देने की बात कही गयी है जिसके तहत वे खुद बताएंगी कि वे श्रम कानूनों का पालन कर रही हैं पर अभी तक इस मसले पर कुछ खास प्रयास नहीं दिख रहे हैं.
उद्योग जगत
उद्योग जगत भ्रष्टाचार और लचर व्यवस्था से निजात पाना चाहता है पर देश का राजनीतिक वर्ग कारोबारियों को समुचित कारोबारी माहौल नहीं मुहैया करा पाया और इस बारे में उनकी तमाम वैध शिकायतें हैं. उनसे जायज काम करने के लिए पैसे मांगे जाते हैं और उन्हें बाबूशाही का शिकार होना पड़ता है. वास्तव में असल मसला न तो मेक इन इंडिया है, न ही मेक फॉर इंडिया. असल मसला है कारोबार की लागत. अगर वह ज्यादा है तो घरेलू खरीदार बहुत अधिक कीमत चुका रहे हैं. ऐसे में बाजार का विस्तार नहीं होगा लेकिन इससे भविष्य में लागत में कमी अवश्य आ सकती है. वहीं उच्च लागत निर्यात को गैर प्रतिस्पर्धी बना देती है. अचल संपत्ति की कीमतों को नियंत्रित करने की कोई योजना नहीं है. कारोबारियों को यह आजादी मिलनी चाहिए कि वे कोई भी वस्तु या सेवा कहीं भी आसानी से और उचित लागत पर तैयार कर सकें या दे सकें. अगर ऐसा हो जाता है तो देश के कारोबारी जगत में उछाल आनी तय है. इतना ही नहीं रोजगार में इजाफा होगा और निर्यात में भी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी. पर सवाल यह है कि क्या सरकार ने उस दिशा में काम करना शुरू किया है?
शिक्षा
देश की शिक्षा व्यवस्था गड़बड़ है. देश को कुशल कामगार की जरूरत है. ये कामगार जिन हजारों औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों से आते हैं, उन्हें सरकार नहीं चलाती. जब लोग कॉलेज से बाहर निकलते हैं तो वे बेरोजगार होते हैं. उन्हें भारी भरकम शिक्षा ऋण चुकाना होता है. हमें अच्छी प्राथमिक शिक्षा की भी आवश्यकता है. इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. हालांकि सरकार कई अप्रासंगिक मसलों में उलझी हुई है वहीं कौशल विकास के बारे में बातें खूब होती हैं लेकिन काम नहीं होता है.
केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन की जगह संस्कृत या कोई अन्य भाषा पढ़ाना कहा तक सही है मेरी समझ में नहीं आता. क्योंकि आज रोजगार पाने के लिए जिस काबिलियत की आवश्यकता है वह ना तो संस्कृत से आती है ना ही हिंदी से और ना किसी अन्य क्षेत्रीय भाषा से, आती है तो सिर्फ अंग्रेजी से. ऐसे में मोदी सरकार के अलावा किसी और को यह समझ नहीं आ रहा है की संस्कृत रोजगारपरक कौशल विकसित करने का जरिया कैसे बन सकती है?
महिला सुरक्षा
'सेव द चिल्ड्रन' रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम के लिंग असमानता सूचकांक में भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे 132वें स्थान पर था.करीब एक चौथाई लड़कियां पांचवीं कक्षा से आगे नहीं बढ़ पाती हैं, जबकि 41 प्रतिशत आठवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती हैं. भारत में 18 साल की उम्र होते-होते करीब आधी लड़कियों का विवाह हो जाता है. भारत की करीब 3.8 करोड़ महिलाएं 'लापता' हैं. दिल्ली के उबर कैब में महिला के साथ बलात्कार की घटना हमें याद दिलाती है कि हमें महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में कितना सफर तय करना है और सरकार महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कितनी गंभीर है?
मोदी सरकार की परेशानियाँ
मोदी सरकार के लिए विधेयक पारित कराने में मुश्किलें आ रही हैं, खासकर राज्य सभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है. कम से कम अगले छह महीने में तो राज्य सभा में दिक्कतें खत्म नहीं होने जा रही हैं. संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में कई बड़े विधेयक पारित होने की आश लगाये बैठे हैं पर  इस महीने की 23 तारीख को संसद का सत्र समाप्त हो रहा है, अब बहुत कम समय को देखते हुए इस बात की उम्मीद कम ही है कि ये विधेयक पारित हो पाएंगे.

संक्षेप में कहें तो विनिर्माण को जीडीपी के 25 फीसदी तक करने के आंकड़े पर ध्यान देने के बजाय सरकार को चाहिए कि वह देश के बढ़ते श्रमिक क्षेत्र के लिए वृहद आर्थिक स्तर पर रोजगार सृजित करने की तैयारी करे. उसे उन जगहों की पहचान करनी होगी जहां बड़ी संख्या में श्रमिक मौजूद हैं और इसके साथ जहां आर्थिक बुनियादी ढांचे की भी आवश्यकता है. ये दोनों एक दूसरे की जरूरत पूरी करने का काम कर सकते हैं.

मेरा अनुमान है कि चरणबद्घ तरीका ही काफी कुछ हासिल करने में मददगार साबित हो सकता है. आर्थिक विकास दर बढ़कर इस साल 5-5.5 फीसदी और अगले साल 6-6.5 फीसदी हो सकती है. वर्ष 2016-17 में यह बढ़कर 7फीसदी हो सकती है. लेकिन इस गति से होने वाला सुधार रोजगार निर्माण में मददगार नहीं होगा. उसके लिए हमें तत्काल श्रमसाध्य विनिर्माण में अड़चनों को दूर करना होगा, चाहे वे श्रम कानून हों, बुनियादी ढांचागत कमियां हों,विदेश व्यापार अड़चनें हों या कौशल की कमी.