Wednesday, 17 December 2014

सुबह यूनिफार्म में अब कॉफिन में: दहसतगर्दी की पराकाष्ठा





पाकिस्तान में पेशावर के एक आर्मी पब्लिक स्कूल में तालिबानी आतंकवादियों ने रूस में 2004 में घटी चेचन्या विद्रोहियों द्वारा बेसलान नरसंहार जिसमे 330 से ज्यादा बच्चे मारे गए थे की भयावह यादों को फिर से ताजा कर दिया है. इस बार आत्मघाती हमलावर अर्द्धसैनिक बल फ्रंटीयर कोर की वर्दी पहनकर स्कूल में घुसे और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू करते हुए हर कक्षा में गए और डरे-सहमे बच्चों पर गोली चलाते रहे. अधिकांश बच्चों को कतारों में खड़ा कर सिर में गोली मारी गयीं. एक फिदायीन हमलावर ने भी खुद को स्कूल की इमारत में विस्फोट करके उड़ा दिया. जिस समय यह घटना हुई उस समय स्कूल में 1500 से अधिक बच्चे थे. याद दिला दूँ की यह वही आतंकी संगठन है, जिसने मलाल के सर में गोली मारी थी. 


इस घटना ने मेरे साथ सहृदयी सम्पूर्ण विश्व को झकझोर कर रख दिया है. हम तो दूर से ही मंजर की झलकी मात्र देख कर सिहर गए हैं और हमारी आत्मा अभी तक इस सदमें से उबर नहीं पाई है. फिर पाकिस्तान के उन मासूम बच्चों के माँ-बाप और परिवार का क्या हाल होगा जिन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े को इसमें खो दिया है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. मुझे अपनी माँ की कही एक बात याद आ रही है-“मैं तुम्हे एक थप्पड़ मार दूँ तो तब तक मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलती जब तक तुम्हें हँसता हुआ न देख लूँ, पर कोई और तुम्हे एक थप्पड़ मार दे तो यह मेरे बर्दास्त से बाहर है.” जो माँ किसी और द्वारा अपने बेटे को एक थप्पड़ मारा जाना बर्दास्त नहीं कर सकती, वह माँ अपने बच्चों को गोलियों से मारे जाने पर कैसा महसूस कर रही होगी, उसकी कल्पना हम-तुम से इतर सिर्फ एक माँ ही कर सकती है. उसकी पीड़ा सोचकर ही मेरा कलेजा मुंह को आ जाता है. यह एक ऐसा विवेकहीन बर्बरतापूर्ण कृत्य है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. हमले में ना केवल मासूम बच्चों का कत्ल-ए-आम किया गया है बल्कि मानवीयता की मूल धारणा को ही मारा गया है.
यह एशिया में अब तक हुई आतंकवाद गतिविधियों में सबसे भयावह और कुरूप मंजर था जिसमें  आतंक की खेती करने वाले पाकिस्तान में 132 मासूम बच्चों और 9 स्कूल के स्टाफ को मौत के घाट उतार दिया गया और 245 अन्य घायल हुए है. स्कूल से जिन्दा बचे बच्चों के शरीर पर गहरे जख्म थे और जिनके शरीर पर कोई घाव नहीं थे उनकी मासूम आंखों में वह दहशत था जिसको उन्होंने महसूस किया था और यह दहशत उनकी जिंदगी से निकल पायेगा अभी यह कहना मुश्किल है.
हमले से बचे बच्चे इस कदर आतंकित थे की वह चीख-चीख कर कह रहे थे कि –“‘मुझे घर ले चलो. मुझे घर चलो. वे फिर आएंगे और मुझे मार डालेंगे.” खौफ का मंजर उसके जहन में जज्ब हो गया था. कईयों के तो गले रुंध गये थे और कई खौफ के कारण बोल भी नहीं पा रहे थे. स्कूल से बाहर खड़े बच्चों के सगे-सम्बन्धी भी रो रहे थे और अपने लाल या प्यारे की एक झलक के लिए लालायित थे. ऐसा करुण दृश्य मैंने इसके पहले नहीं देखा और खुदा से यह दरखास्त है की इस घटने की पुनरावृत्ति ना हो.



इतनी बेरहमी से तो कोई पशुओं को भी नहीं मारता जैसे तालिबान आतंकियों ने स्कूल में धावा बोलकर मासूम स्कूली बच्चों को मारा है. इस पर घटना की जिम्मेदारी लेने वाले संगठन ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ ने बिना शर्म दिखाए यह कहा की यह हमला जिहादियों के परिवार पर होने वाले हमले का बदला है जिससे सेना भी उस दर्द को महसूस करे जैसा वह करते हैं. यह कथन खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे कहावत को चरितार्थ करती है और उनकी कायरतापूर्ण और बर्बर व्यवहार को सबसे सामने लाती है.  क्योंकि ऐसा कृत्य सिर्फ एक बहसी ही कर सकता है, किसी संतान वाले और मानसिक रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति द्वारा ऐसा किया जाना संभव नहीं है. अगर खुदा है तो वह भी आतंकी संगठन द्वारा कत्ल को जायज ठहराने की कोशिश को जायज ठहराने पर अपना सर झुका लिया होगा. विश्व का कोई भी धर्म किसी की जान लेने की इजाजत नहीं देता उस पर मासूम बच्चों की हत्या से तो दोजख भी नसीब नहीं होगा. खुदा और रसूल भी इस नाफ़रमानी की लड़ाई को बर्दास्त नहीं करेगा.
इतना होने पर भी मुझे संदेह है कि पाकिस्तानी सेना और वहां की सरकार अब आतंकियों पर सख्त  कारवाही करेगी और अच्छे-बुरे का भेद करना बंद कर देगी. अब वह समय आ गया है कि पाकिस्तान के शासक और वहां के सैन्य अधिकारी यह समझे कि आतंकियों को पालने-पोसने के परिणाम कितने  भयावह होते हैं. इस बात पर आत्ममंथन करें कि साप को चाहे जितना दूध पिलायें पर मौका मिलते ही वह काट-खाता है. यह राजनीति का विषय नहीं, लेकिन विश्लेषण की बात जरूर है. पाकिस्तान को सबसे पहले यही सबक सीखना होगा कि आतंकवाद को हथियार नहीं बनाया जा सकता. जिसने भी आतंकवाद का फायदा उठाने की कोशिश की वह खुद ही इसका शिकार हुआ.
यह जगजाहिर है कि पाकिस्तानी सेना और सरकार तालिबान आतंकियों के खिलाफ तो सक्रिय है, लेकिन अन्य तमाम गुटों को संरक्षण और समर्थन देने में लगी हुई है. इससे अधिक शर्मनाक और कुछ नहीं हो सकता कि खुद वर्तमान में जो तालिबान आतंकी पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा संकट बन गए हैं उन्हें एक समय पाकिस्तान सरकार का भी सहयोग मिला और सेना का भी. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार ने भी यह कहा कि-‘हम उन आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों करें जो हमें नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं’. अब पूरे पाकिस्तान को, चाहे वह सरकार हो या सेना, आतंकी संगठनों के मामले में अपनी रीति-नीति के विषय में फिर से विचार करना होगा और यह समझाना होगा की रोग कोई भी हो सिर्फ पीड़ा और मुसीबत देता है. इसका जितनी जल्दी ईलाज कर लिया जाय उतना ही अच्छा होता है. आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने के चलते ही आज पाकिस्तान अस्थिर, अशांत और खतरनाक राष्ट्र में तब्दील हो गया है.
भारत को इस मौके पर पाकिस्तान का साथ देने की जरूरत है. दुख और तकलीफ के समय न तो किसी तरह की नाराजगी होनी चाहिए और न ही कहासुनी. आज जब सम्पूर्ण विश्व दुखित है तो हम भी पड़ोसी का गम बांटे. इसके साथ हम अपने देश में भी ऐसी किसी भी वारदात को अंजाम देने की किसी भी आतंकवादी की मंशा से निपटने को भी तैयार रहें.
सम्पूर्ण विश्व को इस बात पर आत्ममंथन करना चाहिए की क्यों इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया यानी आईएसआईएस सबसे खूंखार आतंकवादी संगठन के रूप में उभर रहा है? क्यों अल कायदा कमजोर हो जाने के बावजूद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है? क्यों तालिबान फिर वे चाहे अफगानिस्तान के हों या पाकिस्तान, नए सिरे से मजबूती हासिल करते नजर आ रहे हैं?  

अंत में-
आज कुछ बस्ते घर नहीं जायेंगे
कुछ बच्चे अपनी माँ को नहीं बुलाएँगे
वो 26/11था कल 16/12 था,
कल धरती हमारी थी हथियार तुम्हारे थे,
आज धरती भी तुम्हारी है हथियार भी तुम्हारे है,
फिर भी माँ की आँख भरी दिल सुना है
जज्बात जब्त और जिंदगी भर का रोना है  
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हमे दुःख कल भी था आज भी है....
कैसी होगी उस माँ की हालत जिसके बच्चे ने कहा होगा मैं आज स्कूल नहीं जाऊंगा और माँ ने उसे डाँट- डपटकर जबरदस्ती स्कूल भेजा होगा..