Tuesday, 23 December 2014

16वीं शताब्दी में जहरीला अब है सबसे स्वास्थ्यवर्धक भोजन

टमाटर की उत्पति अमेरिका के दक्षिण एंडीज में तथा  भोजन के रूप में मेक्सिको में इसका प्रयोग आरम्भ हुआ और अमेरिका के स्पेनिस उपनिवेश से होते हुये यह विश्वभर में फैल गया. प्रारंभ में अमेरिका में जब यह पाया गया तो इसे जहरीला समझ कर इसका प्रयोग खाने में नहीं किया गया और अब इसके बिना किसी भी भोजन का लजीज हो पाना मुमकिन नहीं है. अब आलम यह है कि टमाटर का प्रयोग विश्व में आलू के बाद दूसरे नंबर पर किया जाता है.

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स्पेन के ‘टोमेटीना फेस्टिवल’ को कौन नहीं जनता? यह फेस्टिवल टमाटर के बिना अधूरा हैं. जिसमें मैश टमाटर से होली खेली जाती है और यह फेस्टिवल अब भारत में भी खेला जाने लगा है. गत वर्ष देल्ली के छतरपुर में यह फेस्टिवल तब मनाया गया जब टमाटर के दाम बाजार में ज्यादा थे. 7
आज बाजार में जितने भी खाद्य प्रदार्थ उपलब्ध हैं वह बिना टमाटर के उतने लजीज नहीं हो सकते जितने वह हैं. मटर पनीर, कढ़ाई पनीर, चिल्ली पनीर, टमाटर सूप जिसे सुनते ही हमारे मुंह में पानी आ जाता है वह भी बिना टमाटर के नहीं बनते. आप मजे से चिप्स, कुरकुरे, टोमेटो बिंगो कोन, चायनीज क्रिप्सी चिल्ली टोमेटो, पोटैटो आदि खाते हो यदि यदि उसमे से टमाटर निकाल दे तो सोचो उसके स्वाद का क्या होगा? तब शायद आपका सफ़र या पार्टी फीकी पड़ जाएगी. बिना टमाटर के स्वादिस्ट खाना बनाने की कल्पना भी नहीं कर की जा सकती. टमाटर को सब्जी, सलाद और चटनी सभी जगह प्रयोग किया जाता है. टमाटर की चटनी नाश्ते में समोसे, आलू बड़ा, पकोड़े, बड़े, पराठे आदि के साथ खायी जाती है. वैसे टमाटर की मीठी चटनी टुमैटो कैचप या सॉस के रूप में आम बाज़ार में भी मिलती है जिसके बिना बर्गर, पिज्जा, चावमिन, स्नैक्स सभी फीके ही लगेंगे. 3
टमाटर  पौष्टिक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन सी, ए पाये जाते हैं. यह एसिडिटी से राहत, आँखों के लिए फायदेमंद, गुर्दे से रोग के जीवाणुओं को निकालने वाला, मधुमेह के रोगियों के लिए उपयोगी, पाचन एवं प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाला एवं कैंसर के खतरे को कम करने वाला माना जाता है. प्राकृतिक चिकित्सकों का कहना है कि टमाटर खाने से अतिसंकुचन भी दूर होता है और खाँसी तथा बलगम से भी राहत मिलती है इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है. 
इसके साथ हम यह भी जान पाएंगे की जो टमाटर हम बाजार से खरीद के लाते हैं उसके पीछे हमारे किसान भाई कितनी मेहनत करते हैं. टमाटर को उगाने और उसे रोगमुक्त रखने के आलावा उसे बाजार तक पहुँचाने में उन्हें कितनी सावधानी बरतनी पड़ती है. 
आइये जानतें हैं टमाटर की खेती के बारे में-
जलवायु और मिट्टी 
टमाटर पाला नहीं सहन कर सकता इसके लिए 12 डिग्री से०ग्रे० से 26 डिग्री से०ग्रे० तक का तापमान आदर्श होता है. रात का आदर्श तापमान 25 डिग्री से०ग्रे० से 20 डिग्री से०ग्रे० है. टमाटर की फ़सल दोमट मिट्टी में सबसे अच्छी होती है. लेकिन इसकी अगेती क़िस्मों के लिए बलुई तथा दोमट बलुई मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है. इसके अलावा यदि जल निकास की व्यवस्था अच्छी हो तो इसे मटियार तथा तलहटी दोमट में भी उगाया जा सकता है.

 उत्रत किस्में

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हिसार अरूण (सलैक्शल-7): यह एक अगेती किस्म है. रोपाई के लगभग 70 दिनों के पश्चात् फलों की पहली तोड़ाई की जा सकती है. इसके पौधे छोटे और फल पौधों पर काफी संख्या में लदे हुए लगते हैं. इस किस्म के फल सामान्य तौर पर लगभग एक ही समय पर पकते हैं जो मध्यम से बडे आकार के होते हैं. इसकी औसत उपज 120 क्विंटल प्रति एकड़ है. 
हिसार लालिमा (सलैक्शन-18): यह एक अगेती और बहुत लाभदायक किस्म है जिसके पौधें की बढ़वार कम होती है. कोने से पत्ते गहरे कटे होते हैं. फल गोल आकार के बड़े, लाल व आकर्षित, गुद्देदार होते हैं. रोपाई के 65 से 70 दिन के पश्चात् फलों की पहली तोड़ाई की जा सकती है. लगभग 120 क्विंटल उपज प्रति एकड़ प्राप्त की जा सकती है. 
पूसा रूबी: यह अगेती किस्म है, जिसके फल रोपाई के 60-65 दिनों बाद पक जाते है. फल हल्की धारियों वाले चपटे और समान रूप से लाल होते हैं. यह भारी पैदावार देने वाली किस्म हैं. 
पूसा-120:  सुत्रकृमि से होने वाली बीमारियों को सह सकने वाली यह किस्म अधिक पैदावार देने वाली है. जिसके फल मझौले आकार के आकर्षक और समान रूप से लाल होते है.
पूसा शीतल: इस किस्म में मध्यम आकार के चपटे, गोल फल होते हैं. अगेती बसंत ऋतु की फ़सल के लिए उपयुक्त है. 8 डिग्री सें तक तापमान पर इसके फल लग सकते हैं. 
पूसा गौरव: इसके फल अडांकार, चिकने, परत मोटी और लाल होते हैं. यह लम्बी दूरी तक ले जाने की दृष्टि से उपयुक्त है. अधिक उपज देने वाली क़िस्म खरीफ और बसंत दोनों मौसमों के लिए उपयुक्त है. 
पूसा सदाबहार: इसके मध्यम आकार के अंडाकार गोल फल होते हैं. यह उत्तरी भारत के मैदानों में, जुलाई-सितम्बर के अलावा पूरे साल उगाने के लिए उपयुक्त है. 6 डि.ग्री. से०ग्रे० से 30 डिग्री से०ग्रे० तक रात के तापमान पर भी इसके फल लग सकते हैं.
पूसा उपहार: इसके मध्यम आकार के गोल फल होते हैं. फल गुच्छे में लगते हैं. यह भारी पैदावार देने वाली तथा अधिक बढ़वार वाली किस्म है. 
पूसा संकर -1: यह अधिक फलदायक किस्म है. फल मध्यम आकार के चिकने, आकर्षक व गोल होते हैं. यह संकर किस्म जून-जुलाई के अधिक तापमान में भी फल दे सकती है. 
पूसा संकर -4: यह अधिक उपज देने वाली संकर किस्म है. यह किस्म दूर तक ले जाने के लिए उत्तम है. इसके फल गोल आकार के चिकने एवं आकर्षक होते हैं.

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कृषि क्रियाएं 
भूमि की तैयारी 
टमाटर के लिए अच्छी उपजाऊ दोमट भूमि प्रयोग में लायें. खेत की तैयारी के लिए 2-3 बार अंगद ट्रेक्टर हल से जुताई कर फिर लेवेलेर चलाये. खेत में 10 टन गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट खाद पौध-रोपण के लगभग तीन सप्ताह पहले भली प्रकार मिला लें.
बिजाई का समय 
टमाटर के बीज की मुख्यत: नर्सरी में जून-जुलाई में सर्दी की फसल के लिए तथा नवम्बर-दिसम्बर माह में बसन्तकालीन फसल के लिए बिजाई की जाती है. 
टमाटर की पौध तैयार करने के लिए नर्सरी में कुछ सावधानियों की आवश्यकता होती है, खास तौर से वर्षा ऋतु में क्योकि इस मौसम में आर्द्रगलन की समस्या अधिक मात्रा में देखने में आती है. वर्षा में नर्सरी की क्यारी उठी हुई बनायें जिससे कि पौध को अधिक वर्षा के कारण नुकसान न हो. इस प्रकार एक एकड़ में पौध रोपने के लिए लगभग 40 क्यारियों तथा बसन्तकालीन फसल के लिए 15 क्यारियों की आवश्यकता पड़ती है.
टमाटर के बीज को बिजाई के पहले 2.5 ग्राम एमीसान या कैपटान या थिराम नामक दवा प्रति किलो बीज में मिलाकर बोयें. आर्द्रगलन की समस्या होने पर बीज के उगने के बाद 0.2 प्रतिशत (2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में ) कैप्टान से नर्सरी की क्यारियों को तर करें. 
नर्सरी की क्यारियों में बिजाई करने के बाद सड़ी हुई गोबर की खाद में क्यारियों को ढक दें तथा फव्वारे द्वारा सिंचाई करें. अधिक धूप होने पर उचित होगा कि घास-फूस से नर्सरी की क्यारियों को ढक दें तथा बीजों के अंकुरण के बाद इन्हें क्यारियों के ऊपर से हटा दें. ऐसा करने से नर्सरी की सतह पर उचित नमी बनी रहती है जोकि बीज के उगने में मदद देती है. गर्मी के दिनों में आमतौर पर 4 सप्ताह में टमाटर की पौध तैयार हो जाती है जब कि सर्दी के मौसम में लगभग 8-10 सप्ताह का समय लग जाता है. नर्सरी के समय पर सिंचाई करना, खरपतावार निकालना तथा कीट प्रकोप होने पर कीटनाशक दवा का छिड़काव करना भी आवश्यक है. 
बीज की मात्रा
सर्दी की फसल के लिए लगभग 400-500 ग्राम बीज तथा बसन्तकालीन फसल केलिए लगभग 200 ग्राम बीज प्रति एकड़ पर्याप्त होगा. 
रोपाई 
सर्दी की फसल की रोपाई जुलाई-अगस्त में तथा बसन्त कालीन फसल की रोपाई मध्य-जनवरी में करें. आमतौर पर नर्सरी की पौध में 5-6 सच्ची पत्तियां होनी चाहिए। क्यारियों में लाईनसे लाईन की दूरी लगभग 60 सैंटीमीटर तथा पौधों की दूरी 45 सैंटीमीटर रखे एक स्थान पर दो पौध रोपने पर टमाटर की उपज में वृध्दि पाई गई है.
खाद व उर्वरक 
 खेत की तैयारी के समय गोबर या कम्पोस्ट की खाद देने के आलावा एक एकड़ में लगभग 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस तथा पोटाश की कमी वाले क्षेत्र में 20 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ देनी चाहिए. खेत तैयार करते समय फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा व नाईट्रोजन की 1/3 मात्रा दें. नाईट्रोजन खाद की बाकी बची हुई मात्रा क्रमश: पौधरोपण के चार सप्ताह बाद व दूसरी मात्रा के एक माह बाद बराबर-बराबर दें. नाईट्रोजन खाद देने के बाद सिंचाई करना आवश्यक है. टमाटर की चिटकन की समस्या रोकने के लिए 0.3 प्रतिशत बोरोक्स का छिड़काव फल लगने के समय व इसके 15 दिनों के बाद करें तथा तीसरा छिड़काव जब फल पकने शुरू हो तब करें. 
सिंचाई
पहली सिंचाई पौध रोपण के तुरन्त बाद तथा इसके पश्चात् आवश्यकतानुसार 8-10 दिनों  के अन्तर पर करें. टमाटर में सिंचाई मुख्यत: नाली वाली विधि से की जाती है. टमाटर के पकने की अवस्था में सिंचाई की कमी कर दें. 
खरपतवार नियन्त्रण 
साधारणतया: दो निराई-गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है- पहली लगभग 20-25 दिनों के बाद  तथा दूसरी पौध रोपण के 40-45 दिनों के बाद. इसी समय मिट्टी चढ़ाने का काम भी करना चाहिए. टमाटर की फसल में रासायनिक खरपतवार नियन्त्रण भी संभव है. इसके लिए पैन्डीमैथालिन नामक दवा का 400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से (स्टोम्प 30 प्रतिशत का 1.3 लीटर) पौध रोपण के लगभग 4-5 दिनों बाद छिड़काव करें.
वृद्धि  नियामक का प्रयोग: 
टमाटर के फलों को कम व अधिक तापमान में सुचारू रूप से पकने के लिए पैराक्लोरोफिनाग्जी-एसिटिक एसिड (पी.सी.पी.ए) के 50 पी.पी.एम (10 ग्राम पी.सी.पी.ए) को थोडे से अल्कोहल में घोल कर फिर 200 लीटर पानी में मिलाकर टमाटर के पौधों पर फूल की अवस्था में छिड़काव करना चाहिए. 
कटाई
टमाटर के फलों को जब उनकी बढ़वार पूरी हो जाय तथा लाल व पीले रंग की धारियां दिखने लगें उस अवस्था में तोड़ लेना चाहिए व कमरे में रखकर पकाना चाहिए. टमाटर को पौधे पर पकाने की अवस्था में चिड़ियों से नुकसान होने की सम्भावना रहती है तथा साथ ही टमाटरों को लम्बे स्थानों तक भेजने में भी दिक्कत आती है. पेटी में टमाटर रखते समय अधपके पहले और फिर पके हुए रखने चाहिए. 
हानिकारक कीड़े 
सफेद मक्खी: यह सफेद-मटमैले रंग की अंडे के आकार की छोटी मक्खी होती है. इसके सफेद पंखों पर मोम की तह होती है. शिशु व प्रौढ़ पत्तों  की निचली सतह से रस चूसते हैं. जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं. यह मक्खी मरोड़िया (विषाणु) रोग फैलाता है. प्रकोप बरसात की फसल में अधिक होता है.
रोकथाम: इस कीट के नियन्त्रण के लिए 400 मि.ली. मैलाथियान 50 ई.स. को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ 15 दिन के अन्तर पर छिड़काव करें. 
फल छेदक सूण्डी (हेलिकोबरपाआर-मौजेरा): यह हरे या पील-भूरे रंग की सूण्डी है. इसके शरीर के ऊपरी भाग पर तीन लम्बी कटवांसलेटी रंग की दोनों और सफेद धारियां होती हैं. ये सूण्डियां कोमल पत्तियों  को खाती हैं और कलियों, फूलों में सुराख कर देती हैं. ग्रसित फल बाद में सड़ जाते हैं. 
रोकथाम: इस कीट का प्रकोप होने से नीचे लिखी किसी एक कीटनाशी का छिड़काव (250 लीटर पानी में) प्रति एकड़ करें. आवश्यकतानुसार छिड़काव 15 दिन के अन्तर पर दोहरायें: (क) (1) 74 मि.ली. फैन्वेलरेट 20 ई.सी., (2) 200 मि.ली. डेल्टामेथ्रिन 2.8ई.सी, (3) 60 मि.ली. साइपरमेर्थ्रिन 25 ई.सी/मि.ली साईपरमेथ्रिन 10 ई.सी. (ख) (1) 500 मि.ली. एण्डोसल्फान 35 ई.सी (2) 500 ग्राम कार्बेरिल 50 घु.पा.

नोट:- (1) छिड़काव से पहले खाने योग्य फल अवश्य तोड़ लें. (2) कीटग्रसित फल तोड़कर मिट्टी में दबा दें. (3) जरूरत पड़ने पर बारी-बारी से ‘क’ और ‘ख’ में दी गई कीटनाशियों को छिड़कें. 
बिमारियां व उनकी रोकथाम
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आर्द्रगलन रोग: इस रोग से पौधे उगने से पहले और उगने के कुछ ही दिन बाद मर जाते हैं.
रोकथाम: बिजाई से पहले बीज का उपचार ढाई ग्राम एमीसान या कैप्टान या थीराम  दवाई एक किलो बीज में मिलाकर करें.
उगने के बाद पौधों को गिरने से बचाने के लिए 0.2 प्रतिशत (2ग्राम दवा पति लीटर पानी में) कैप्टान के छिड़काव से नर्सरी की सिंचाई करें. 
अगेती झुलसा रोग: गोल और तिकोने गहरे-भूरे या काले दाग पत्तों और फलों पर पड़ जाते हैं. तने पर पहले अंडाकार और फिर बेलनाकार से घाव बन जाते हैं. जिससे पौधे सूखकर मर जाते हैं. फलों पर धब्बे टहनी वाली तरफ से आरम्भ होते हैं. 
रोकथाम: (क) पानी की अधिक सिंचाई न करें. (ख) खूब गली-सड़ी खाद डालें. (ग) आर्द्रगलन बीमारी के लिए बनाई गई दवाई के बीज का उपचार करें. (घ) फसल पर जीराम/जीनेब/इण्डोफिल एम-45 का 400 ग्राम प्रति एकड़ (200 लीटर पानी में) के हिसाब से 10-15 दिन के अन्तर पर छिड़काव करें.  
विषाणु रोग: पौधों की बढ़वार रूक जाती है, पत्तिायां मोटी, मदी, मुडी हुई और गल भी जाती है. तने पर धारियां पड़ जाती है. फल बहुत ही छोटा रह जाता है जो मरा हुआ सा दिखाई देता है. 
रोकथाम: (क) स्वस्थ और रोगरहित बीज लें. (ख) बीमारी फैलाने वाले कीड़ों का नर्सरी व खेतों में इलाज करें । 10-15 दिन के अन्तर पर कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव करें, जैसा कि सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए बताया गया है. रोगी पौधों को आरम्भ में ही निकाल कर नष्ट कर दें. 
जड़ गांठ रोग: जड़ों की गांठों वाले सूत्रकृमि से ग्रस्त पौधे पीले पड़ जाते हैं तथा उनकी बढवार रूक जाती है. पौधों  की जड़ों में गांठे बन जाती हैं या वे फूल जाती है.
रोकथाम: इसकी रोकथाम के लिए नर्सरी के लिए नर्सरी में कार्बोफ्यूरान (फ्यूराडान-3 दानेदार) 7 ग्राम प्रति वर्ग मीटर भूमि में मिलायें. मई व जून में खेत की 2 से 3 गहरी जुताइयां (10 से 15 दिन के अन्तर से) करने से सूत्रकृमियों की संख्या बहुत घट जाती है. सूत्रकृमि ग्रस्ति खेतों में टमाटर की हिसार ललित किस्म लगायें. 
पैदावार: 
सामान्य प्रजातियों की पैदावार 300 से 350 कुन्तल प्रति हैक्टर संकर प्रजातियों की पैदावार 550 से 600 कुन्तल पैदावार प्रति हैक्टर होती है.
अपने पोषक गुणों एवं विविध उपयोगों के कारण टमाटर सबसे महत्वपूर्ण सब्जी वाली फ़सल है. इसका उपयोग बीमार को स्वस्थ्य बनाता है, चेहरे पर पेस्ट के रूप में लगाने पर सौन्दर्य बढ़ाता है, स्नेक्स में पड़ जाय तो स्वाद बढ़ाता है और चटनी और स्वांस के रूप में जयका बढ़ाता है. टमाटर के बिना सब्जी की कल्पना ही नहीं की जा सकती. 

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