Thursday, 4 December 2014

ऐसे नहीं हासिल होगी सम्पूर्ण स्वछता


हम आज कल रोज टीवी पर किसी ना किसी को स्वच्छता अभियान की बात करते और सफाई करते हुए देख रहे हैं पर मेरे मन में यह सवाल उठता है की क्या मौजूदा स्थिति से चलते हुए हम 2019 तक  सम्पूर्ण स्वच्छता का लक्ष्य  हासिल कर पाएंगे. लोग तो घर से निकल कर सफाई कर रहे है परन्तु जिनपर सफाई की जिम्मेदारी है वह अभी भी मौन हैं.
अब अगर आस-पास फैले कूड़े की बात करें तो  हमें यह सोचना होगा की सड़कों पर और हमारे अगल-बगल कचरा आता कहाँ से है? सीधा जबाब है-हमारे-आपके घरों से और हमसे. हम स्नैक्स, पानी की बोतल खरीदते हैं और जब वह ख़त्म हो जाती है तो उसे यदि वाहन से हैं तो बाहर की तरफ और यदि पैदल चल रहे हों तो सड़क पर ही फेक देते हैं. घर के कूड़े को खाली पड़े प्लाट में या सड़कों पर फेक दिया जाता है. चिंता यह होती है की हमारा घर साफ रहे. स्टेशन प्लेटफार्म पर ही खाना खा लेते हैं और बचे खाने को वही फेक देते हैं, कुछ माताएं अपने छोटे बच्चों को रेल पटरियों पर ही पखाना करा देती हैं, स्टेशन पर रुकी हुए ट्रेन में लोग पखाना करतें हैं जिससे रेलवे पटरियां और प्लेटफार्म गन्दा हो जाता हैं. अभी तक ट्रेनों में इस बाबत कोई योजना नहीं लाई गयी है. ट्रेनों में फलों के छिलके, मूंगफली के छिलके बिखराकर, अख़बार, पानी की बोतल को छोड़ कर यात्री चले जाते हैं. इससे भी बुरी स्थिति बस स्टैंड़ों की होती है जहाँ दीवार के हर तरफ लोग पेशाब करते हैं जिससे सारा बस स्टैंड ही दुर्गन्धपूर्ण हो जाता है. जहाँ कूड़ेदान बना है या कूड़ा डालने की व्यवस्था है वहाँ लोग कूड़े को उचित ढंग से नहीं रखते और प्रायः कूड़ा बाहर तक अव्यवस्थित रूप से बिखरा रहता है और उसमें  से कूड़े की दुर्गन्ध आ रही होती है जिससे वहां से गुजरना मुस्किल हो जाता है. सड़को पर नालियों एवं सीवर का पानी बहता रहता है.
लोग पॉलिथीन का प्रयोग कर इसे फ़ेंक देते हैं जो नालियों और नालों में जाकर उसे जाम कर देते हैं जिससे बारिश में मुहल्लों में पानी भर जाता हैं वही ये बहकर गंगा यमुना एवं अन्य नदियों को प्रदूषित कर इनके तटों को गंदा करते हैं और नदियों के प्रवाह को भी प्रभावित करते हैं. गन्दगी में 80 प्रतिशत योगदान पॉलिथीन का ही होता है. नदियों में  पूजन सामग्री, घर की मूर्तियां या प्लास्टर ऑफ पेरिस व केमिकल युक्त दुर्गा, गणेश प्रतिमा नदियों में विसर्जित करते हैं साथ ही मृत पशुओं व बच्चों के शवों को भी इसमें बहा दिया जाता है. उद्योगों और नालों का पानी आज भी नदियों में ही मिल रहा है. ई-वेस्ट में कंप्यूटर और मोबाइल सम्बंधित कचरा सबसे तेजी से बढ़ रहा है.
शहरों में इस अभियान को हवा दी जा रही है पर ग्रामीण इलाकों में इसकी गूंज सुनाई नहीं पड़ रही . मात्र शहर के साफ़ होने से भारत साफ़ होने वाला नहीं है ग्रामीण इलाकों को भी सीके दायरे मैं लाना होगा. पर अधिकांश ग्रामीण इलाकों में सफाई की बात करना ही व्यर्थ है क्योंकि  वहाँ ना तो नालियों का निर्माण  हुआ है और ना ही सड़कों का साधनहै, पीने का पानी की भी उचित व्यवस्था नहीं है . जहाँ नालियाँ हैं वहाँ पानी को गड्ढे में खुले में ही छोड़ दिया जाता है और जानवर उसे पीतें हैं. सड़कों का विकास ना होने के चलते बरसात में कच्ची सड़कों पर कीचड़ ही कीचड़ हो जाता  है. जानवर के गोबर भी इधर –उधर बिखरे होते हैं और कूड़े को लोग इधर-उधर फेक देते हैं. इसके अतिरिक्त आधी आबादी खुले में शौच कर वातावरण को अशुद्ध कर रही है, जिनके यहाँ शौचालय सुविधा है वे भी खुले में ही शौच करते हैं.
पशुओं को खुले में छोड़ दिया जाता है जो सड़कों पर मल-मूत्र, गंदगी आदि तो फैलाते ही हैं साथ ही इनसे सड़कों पर जाम भी लग जाता है. लोग पान, गुटका खाकर थूकते हैं जिससे सार्वजनिक स्थलों, ऑफिस, बैंक आदि सभी रंगीन थूक से रंग गएँ हैं. कुछ लोग सभ्य बनकर उसे बेसिनों में कुछ बाथरूम में या कुछ डस्टबिन में थूकते हैं पर वह जहां भी थूकते है वह स्थान गंदा ही होता है.
सफाई कर्मचारी भी अपने काम में ढीलाधवाली करते हैं बिना पैसा लिए कूड़ा तक नहीं उठाते. नाली साफ कर कचड़े को नाली किनारे ही सुखने के लिए छोड़ देते हैं, जो महीनों तक वहीं सूखने के बाद फिर से नाली में ही मिल जाती हैं. शहरों से कूड़ेदान तक गायब हैं, बहुत खोजने के बाद इनके मिलाने की उम्मीद होती है इसीलिए सजग आदमी भी जब कूड़ादान नहीं पाता तो कूड़े को ऐसे ही फेक देता है.


अब हमें वास्तव में 2019 तक सम्पूर्ण स्वछता चाहिए तो सबको कमर कसनी होगी.स्वछता को  नैतिक कर्त्तव्य के साथ-साथ वैधानिक कर्त्तव्य भी बनाना होगा. सबको यह प्रण लेना होगा की हम ना तो कूड़ा फैलायेंगे और ना ही फ़ैलने देंगे और जो ऐसा नहीं करेगा उसे दण्डित किया जायेगा तथा साथ ही ठोस कूड़े एवं ई-वेस्ट के निपटान के लिए भी सरकार पर दबाव बनायेंगे. सफाई कर्मचारी को भी नियमित सफाई के लिए विवश करेंगे. तब जाकर कहीं स्वच्छ होगा सम्पूर्ण भारत नहीं तो आप ढोल पिटते रहो कोई फायदा होने वाला नहीं है. यह अभियान भी हर अभियान की तरह कुछ दिन में दम तोड़ देगा.