Saturday, 4 April 2015

कृषि कैसे बने फायदे का सौदा

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आज खेती घाटे का सौदा बना हुआ है और किसान भाई उर्वरक, कीटनाशक, हाइब्रिड बीज, खरीद-खरीद कर परेसान हैं. ऊपर से बैल तो अब किसी के पास ढूढ़ने से ही मिलता है. लगातार दूध देने वाले पशुओं की संख्या भी परिवार जनों के हिसाब से कम होती जा रही है. गाँव की रसोई में भी एलपीजी का प्रयोग बढ़ने लगा है और थोड़ी दूर जाने या दैनिक जरुरत के लिए बाजार करने के वास्ते लोग मोटरसाईकिल का प्रयोग कर रहे हैं. अब वो किसान नहीं रहे जो दुपहरिया में भी हल लेकर जुटे रहते थे और उपज के हर दाने में उनकी मेहनत लगती थी. लोग गर्मी,सर्दी और बरसात नहीं देखते थे. बल्कि श्रम का गान गाते थे जिसे सुन कर उनकी फसले ख़ुद-बखुद पैदा हो जाती थी और बखार भर जाते थे. प्रजाजन को भी पैसे के बदले अनाज दिया जाता था और हरवाहे, धोबी, कहार, भड़भूजे वाले खेत से ही बंधा भोझ उठाकर घर ले जाते थे. लोग डट कर मेहनत करते थे और स्वस्थ रहते थे खुद पेट भर खाते थे और बांटने में भी पीछे नहीं हटते थे. एक-एक आदमी भदेली भर रस-मट्ठा गटक जाता था और निःरोग रहता था. तब न ब्लडप्रेसर था और न ही हार्टअटैक और न अन्य बीमारियाँ. लोग टूटी-फटी मढैया और कच्चे घरों की ठंडी छाँव में आराम से जेठ और पूस की दोपहरिया आम का रस पीकर बिता देते थे. स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च बहुत कम था. लोग मोटा खाते थे और मोटा पहनते थे. कितने किसान अंगोछा और बनियान में ही दिन गुजार देते थे. 

लोगों की आवश्यकताएँ कम थी और मेल-मिलाप का समय ज्यादा. चार-पांच कोस के लोगों के खानदान के बारे में लोग यूँ ही बता दिया करते थे. न किसी खास एड्रेस की जरुरत होती थी और न ही किसी खास पहचान की. लोगों में धर्म के प्रति आस्था थी और एक दुसरे के प्रति सहानभूति. लोग कोसों पैदल ही चला जाया करते थे. आग लगने, डाका पड़ने, या किसी अन्य आपदा के समय सारा गाँव तो छोड़ो पंचायत तक इकठ्ठी हो जाती थी. 

पहले खेती में लागत न के बराबर थी और उत्पादन भी अधिक था. कृषि में लगने वाले अधिकांश सामान चाहे बीज हो, खाद हो घर से ही डाले जाते थे और जैविक विधि से खेती की जाती थी. उर्वरक की जगह कम्पोस्ट खाद, राख और नीम से तैयार रसायन का प्रयोग किया जाता था.

पर इस समय जब खेत का मशीनीकरण किया जा रहा है तब भी वांछित पैदावार नहीं हो रही है. आज छोटे किसानों की जरुरत के हिसाब से छोटे कृषि यंत्र यथा-डीजल हल, पॉवर विडर, पॉवर टिलर, ट्रेक्टर, जल पम्प, स्प्रे पम्प आदि उपलब्ध हैं. बैल से किया जाने वाला महीनों का काम हफ़्तों में समेत दिया जा रहा है. मजदूर की राह नहीं देखनी पड़ रही है और किसान खुद अपने परिवार के साथ खेत के सारे काम निपटा ले रहा है. फिर क्यों कृषि घाटे का सौदा बनी हुई है आज इसकी पड़ताल करते हैं-   

खेती लाभदायक दो ही स्थितियों में बन सकती है- 1. उत्पादन को बढ़ाकर व 2. लागत खर्च को कम करके. कृषि में प्रायोजित होने वाले मुख्य आदान हैं बीज, पौध पोषण के लिए उर्वरक व पौध संरक्षण, रसायन और सिंचाई. खेत की तैयारी, फसल काल में निराई-गुड़ाई, सिंचाई व फसल की कटाई-गहाई-उड़ावनी आदि कृषि कार्यों में लगने वाली ऊर्जा की इकाइयों का भी कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान है.

इन सभी का उपयोग किया जाना जरुरी है परन्तु यदि इनका उपयोग सही समय पर सही तरीके से नहीं किया गया तो खेत में इकाई उर्जा की मात्रा बढ़ जाएगी और फिर भी फसल उत्पादन का पूर्ण लाभ नहीं उठाया जा सकेगा. 

फसल चक्र का पालन और मृदा जांच:  अपव्यय रोकने और पूर्ण फसल के लिए समयावार चक्र का पालन जरुरी है. जिससे इस पर लगाने वाली लागत को कम किया जा सकता है.  मृदा जांच कर ही फसल का निर्धारण भी फसल उत्पादकता को बढ़ाता है और फसल का खेत के अनुसार वितरण भी सुनिश्चित करता हैं. यह किसानों को अनावश्यक नत्रजन, पोटाश, फोस्फोरस जैसे उर्वरक डालने से भी बचाता है. इनसे कृषकों को अधिक लाभ मिलने के साथ ही पर्यावरण को प्रदूषित होने से भी बचाया जा सकता है. 

पौध पोषण: पौध पोषण के लिए बाजार से खरीदे गए रासायनिक उपयोग में लाए जाते हैं. प्रयोगों से यह देखा जा चूका है की रासायनिक उर्वरक के रूप में डाली जाने वाली नत्रजन (जो यूरिया, अमोनियम सल्फेट आदि के द्वारा दी जाती है) का सिर्फ 33-38 प्रतिशत भाग ही फसल को प्राप्त हो पाता है. शेष सिंचाई जल के साथ नाइट्रेट्स के रूप में रिसकर या कम नमी की अवस्था में गैसीय रूप में वातावरण में मिल जाता है. इसी तरह फास्फोरस का 20 अंश एवं पोटाश का 40 से 50 प्रतिशत अंश ही फसल को मिल पाता है. फास्फोरस का 80 प्रतिशत अंश तक काली चिकनी मिट्टी के कणों के साथ बँधकर पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाता है.

जैविक खाद का प्रयोग: इन उर्वरकों की मात्रा को कम करने एवं उपयोग क्षमता को बढ़ाने में जीवांश खाद जैसे गोबर की खाद या कम्पोस्ट या केंचुआ खाद आदि का प्रयोग लाभदायक पाया गया है. ये जैविक खाद किसान अपने घर पर खुद ही तैयार कर सकते हैं. इनके अलावा अखाद्य तेलों जैसे नीम, करंज आदि की खली का उपयोग किया जा सकता है. इन खलियों के चूरे की परत यूरिया के दाने पर चढ़ाकर यूरिया के नत्रजन को व्यर्थ नष्ट होने से बचाया जा सकता है. जहाँ तक हो सके किसान जैविक तरीके की खाद पर ही निर्भर हो क्योंकि पंजाब में यूरिया की अधिक मात्रा का दुष्परिणाम बंजर हो रही कृषि के रूप में सबके सामने है. 

दलहनी फसलों का प्रयोग:  नत्रजन वाले उर्वरकों की निर्भरता को कम करने के लिए जीवाणु कल्चर राइजोबियम या एजेक्टोबेक्टर का उपयोग, गेहूँ, जुवार, मक्का, कपास आदि फसलों के साथ अंतरवर्तीय फसल के रूप में चना, गेहूँ, उड़द, अरहर, चौला आदि का उपयोग लाभदायक पाया गया है. ये दलहनवर्गीय फसलें वातावरण की नत्रजन को लेकर न सिर्फ अपने उपयोग में लाती है, बल्कि अपनी जड़ों में स्थिर नत्रजन का लाभ साथ लगाई गई अंतरवर्ती को भी पहुँचाती हैं. फास्फोरस की उपयोग क्षमता को बढ़ाने के लिए फोस्फोरस घोलक बैक्टीरिया का उपयोग किया जाना चाहिए.

बायो-गैस और दुधारू पशु: भारत में अभी भी गोबर का उपयोग उपले या कंडे बनाकर ईंधन के रूप में किया जाता है. इसे गोबर गैस में परिवर्तन नहीं किया जाता. यदि इस पर काम किया जाय तो हर घर को प्रदुषण फ्री गैस ईंधन के रूप में मिल सकेगी और गोबर खाद की गुणवत्ता भी बेहतर हो जाएगी. इसके अतिरिक्त इससे रात्रि के समय प्रकाश करने और छोटी मशीनों को चलाने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. दुधारू पशु बढ़ने से डेरी को बढ़ावा मिलेगा और किसान की आय में बढ़ोत्तरी होगी. जैसा की देखा जा सकता है की समय के साथ-साथ दूध की कीमते बढ़ती जा रही हैं.

फसल कटाई के बाद खेत में आग लगाने के बजाय जोत कर छोड़ देना: गेहूँ की फसल की कटाई के बाद खेतों को आग लगाकर साफ करने की प्रथा को बंद किया जाना चाहिए क्योंकि इससे खेत में मौजूद जीवांश भारी मात्रा में जलकर नष्ट हो जाते हैं. फसल काटने के बाद खेत को मिट्टी पलटने वाले हल (रिज़र) से जोत कर छोड़ देना चाहिए. जिससे खेत में पड़े डंठल, ठूंठ आदि मिट्टी में दब जाते हैं और वर्षा का जल पड़ते ही यह स्वतः विघटित होकर जीवांश खाद में बदल जाते हैं. 

सिंचाई के नवीन तरीके अपनाना: फसलों की सिंचाई के लिए कम पानी में अधिक सिंचाई की विधि का इस्तेमाल करना चाहिए. कम पानी में अधिक सिंचाई के लिए एक नाली छोड़कर एकांतर (अल्टरनेट) सिंचाई, स्प्रिंकलर (फुहार) सिंचाई, टपक सिंचाई आदि विधियों का प्रयोग करना चाहिए.

पौध संरक्षण: रोगों और कीड़ों की बहुतायत आधुनिक और लगातार कृषि की देन है. हमारा लक्ष्य फसलों को इनके द्वारा की जाने वाली हानि से बचाना है न कि नष्ट करना. कीट व रोगनाशक रसायनों का असर सिर्फ नुकसान करने वाले कीड़ों व रोगों पर न होकर लाभ पहुँचाने वाले कीड़ों व रोगों पर भी होता है. इन्ही के कारण मधुमक्खियों की संख्या लगातार कम हो रही हैं और गिद्ध गायब ही हो गए हैं. ये रसायन खेत में पाए जाने वाले केंचुए को भी नष्ट कर देते हैं. 

अतः पौध कीट और रोगनाशकों को रोकने के लिए परजीवी व शिकारी कीड़ों व कीड़ों को हानि पहुँचाने वाले कवकों (फफूँदों) व वायरस का प्रयोग असरकारक पाया गया है. इनके अलावा नीम, करंज, हींग, लहसुन, अल्कोहल आदि के उपयोग, अंतरवर्ती फसल, प्रपंची फसल फेरोमेन, ट्रेप, प्रकाश प्रपंच आदि साधनों के उपयोग से रसायनों के उपयोग पर खर्च होने वाली राशि में कमी की जा सकती है. कीटनाशी रसायन अंतिम विकल्प के रूप में ही काम में लाएँ जाने चाहिए.

कृषि यंत्रो का प्रयोग: आज बिना कृषि यंत्रो से समय पर खेती करना काफी मुश्किल है फिर छोटे कृषि यंत्रों की कीमत भी बैल की खरीद से कम है. आज बैल की जोड़ी 60,000 से ज्यादा दाम में आती है और उस पर प्रति महीने 3 हजार से ज्यादा का खर्च उसके खान-पान पर आता है ऊपर से उसके बीमार पड़ने का खतरा भी बना रहता है. बैलों से कृषि कार्य में समय भी अधिक लगता है. आज कल छोटे किसानों के लिए बाजार में डीजल हल उपलब्ध है जिसमें खेती के सारे अटैचमेंट भी लग जाते हैं और एक मशीन से ही खेती के कार्य किये जा सकते हैं और ये काफी किफायती दाम में उपलब्ध हैं. इन यंत्रों की विशेषता यह भी है की इन्हें महिला और पुरुष दोनों द्वारा संचालित होने वाला बनाया गया है. 


इन यंत्रो की सहायता से किसान खरीफ, रबी, जायद के आलावा कैश क्रॉप, बागवानी फसलों को लगा कर अपनी आय बढ़ा सकता है और खेत का भी उचित उपयोग कर सकता है.