Friday, 4 September 2015

पोर्नोग्राफी

Think About India

बात पोर्नोग्राफी की हो, तो समाज के तथाकथित लोगों को तीन चिंताएं अधिक सताती हैं- यौन हिंसा, इसकी लत लगना और बच्चों को इससे बचाना.
1. जहां तक पहली चिंता की बात है यौन अपराधों और पोर्नोग्राफी में कोई संबंध नहीं पाया गया है. दुनिया में कई अध्ययन किए गए हैं और इसमें कोई ऐसा सबूत नहीं मिला है. महिलाओं के खिलाफ हिंसा तो उन देशों में बढ़ी जहां पोर्न कानून उदार बना दिए गए और पोर्नोग्राफी पर सेंसरशिप लागू करने पर ऐसे अपराध कम हुए.
2. दूसरी चिंता है लत लगने की तो शराब की भी लत लग जाती है. दशकों के अनुभव से हमने सीखा है कि अल्कोहल पर पाबंदी काम नहीं करती. जब-जब शराबबंदी लगाई गई यह भूमिगत होकर वेश्यावृत्ति जैसे आपराधिक हाथों में चली गई.
3. जहां तक बच्चों के संरक्षण की बात है, इसकी कुंजी वयस्कों की स्वतंत्रता पर रोक लगाने में नहीं है बल्कि पालकों के स्तर पर सतर्कता बरतने की है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एचएल दत्तू ने पिछले माह यह कहकर इंटरनेट साइट्स को सेंसर करने से इनकार कर दिया कि, 'कोई अदालत में आकर कहेगा कि देखो, मैं वयस्क हूं और आप मुझे मेरे कमरे की चार दीवारों के भीतर इसे देखने से कैसे रोक सकते हैं?' उन्होंने कहा कि इससे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होता है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जीवन के मौलिक आधार का अभिन्न अंग है.
पोर्नोग्राफी के नकारात्मक पक्ष से निपटने का सबसे अच्छा समाधान प्रशिक्षित शिक्षकों पालकों द्वारा सेक्स शिक्षा देने में है. जब आप किसी विषय पर खुले में विचार करते हैं तो इससे स्वस्थ व्यक्ति का विकास होता है.
भारत के वयस्क यह निर्णय लेने के काबिल हैं कि उन्हें क्या देखना है, क्या नहीं. सभ्य होने का अर्थ है कि आप कह सकें : मैं बीफ तो नहीं खाता, लेकिन आप के खाने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है. मैं पोर्न तो नहीं देखता, लेकिन आपके देखने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है. एक स्वतंत्र, सभ्य देश में हम उन लोगों का सम्मान करना सीखते हैं, जो हमसे अलग राय रखते हैं. सेंसर करने या प्रतिबंध लगाने की बजाय आइए, अपनी खुली, उल्लास से भरी भारतीय परंपरा से सीखने की कोशिश करें, जिसने सिर्फ काम को सभ्यतागत जगह दी बल्कि प्रेम यौनेच्छा पर महान काव्य कला को प्रोत्साहित किया. आम नागरिक पर भरोसा दिखाकर हम संविधान की भावना पर भी खरे उतरेंगे.