Friday, 26 December 2014

अपना ना कोई घर ना आशियाना है

हर आदमी काम से फुर्सत पाकर घर जाने के जल्दी में होता ही और घर पहुचकर उसे सुकून सा मिलता है. दिन भर आदमी, पशु चाहे जहाँ रह ले परन्तु शाम होते ही उन्हें अपने घरोंदे की याद सताने लगती  है. सर्दी का मौसम घर में रहने वाले लोगों के लिए तो बेहद रूमानी और खूबसूरत होता है, लेकिन इसी भारत के वे लोग जो एक अदद घर के अभाव में खुले आसमान के नीचे फुटपाथ पर अपना जीवन गुजारने को मजबूर  हैं, के लिए सर्दी का मौसम बड़ा ही त्रासद हो जाता है. सर्दी आते ही लोग अपने लिए सर्दियों के तरह-तरह के इंतजामात करने लगते हैं, लेकिन वे लोग क्या करें जिनके पास सर छुपाने के लिए छत नहीं है और महंगे घरों में किराये पर कमरा लेना उनके बस का नहीं. उनके नसीब में तो सर्दियों की भयानक राते ठिठुरते हुए फुटपाथ पर ही गुजारनी होती हैं.
 
कौन है बेघर
जनगणना के अनुसार बेघर वह है जो किसी मकान में न रहकर सड़क किनारे, रेलवे प्लेटफार्म, फ्लाई ओवर के नीचे अथवा खुले में रहते हैं. बेघर होना एक प्रकार से आर्थिक रूप से कमजोर होने की स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने लिए स्थाई और सुरक्षित आवास का इन्तेजाम नहीं कर पाता.
 
वर्तमान स्थिति  
बेघर लोगों से सम्बंधित आंकड़ों पर एक नज़र डालें तो सन 2011 की जनगणना में देश में बेघरों की संख्या में कुछ कमी होने की बात करते हुए उनकी संख्या 18 लाख के आसपास बताई गई है.  संभव है हालांकि कुछेक सामाजिक संस्थाओं की मानें इन आंकड़ों को खारिज करते हुए देश में बेघरों की संख्या इन आंकड़ों से कहीं अधिक होने की बात कही जाती रही है.  अब वास्तविकता जो भी हो, पर अगर हम जनगणना के उक्त आंकड़ों को ही सही माने तो भी सवाल उठता है कि आज जब हम आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना संजो रहे हैं और हमारे देश की आबादी के एक हिस्से के पास सर छुपाने के लिए छत तक नहीं है. अब हम यदि सिर्फ दिल्ली की बात करें तो दिल्ली सरकार के अनुसार यहाँ करीब पचास हजार बेघर रहते हैं. आंकडे को छोड़ भी दे तो दिल्ली के फुटपाथ बेघरों का हाल बयां कर देते हैं कि कैसे रात गए दिल्ली के फुटपाथ बेघर लोगों से भरे रहते हैं. उदहारण के लिए सराय काले खां बस अड्डे में फुटपाथ पर ठिठुरते बेघर देखे जा सकते हैं.
 
दारुण स्थिति
ठंडी के मौसम में बेघर लोगों की हालत और भी दारुण हो जाती है. ठण्डी में बिना विशेष बिछौने-ओढ़ने के खुले आसमान के नीचे इन बेघर लोगों को ठिठुरते हुए रात बितानी पड़ती है. इसके अतिरिक्त सर्दियों में कितने दफे कुछ दिखाई ना पड़ने के कारण गाड़ियाँ फूटपाथ पर चढ़ जाती हैं और बेहद दर्दनाक मौत के शिकार हो जाते हैं. 

हालांकि ठंडी के मौसम में सरकारों द्वारा इन बेघर लोगों के लिए रैन बसेरों आदि के इंतजाम करने की बात की जाती हैं, पर यदि सच्ची बात कहें सरकार के दावे कुछ और होते हैं और जमीन पर उनका क्रियान्वयन कुछ और. इसका प्रमाण है कि हर ठंडी घर व ठण्ड से बचने के लिए आवश्यक संसाधन न होने के कारण तमाम बेघर लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है. अब अगर सरकारों द्वारा समुचित इंतजाम होते तो शायद ठण्ड से ये मौतें न होतीं. इस ठंडी जब दिल्ली में उसकी अपनी कोई सरकार नहीं है और राष्ट्रपति शासन के तहत उसका शासन केंद्र सरकार के ही हाथों में है, तब इन बेघर लोगों को ठण्ड से बचाने के लिए सरकार की तरफ से रैन बसेरों के अतिरिक्त नए कम्बल व चाय-नास्ता आदि के इंतजाम भी किये गए हैं. पर जमीनी हकीकत यह है की लोग रैन बसेरों में आ नहीं रहे क्योंकि उनको बनाये गए रैन बसेरों के बारे में जानकारी नहीं है और ना ही सरकार ने ही इसके लिए जन-जागरूकता फैलाई है. एक अन्य कारण सरकार की तरफ से यह भी पेश किया जा रहा है कि काफी बेघर नशा करते है और रैन बसेरे में इसकी इजाजत नहीं है जिससे भी ये यहाँ आने से बचते हैं. यमुना बाजार पुल के नीचे सरकारी रैन बसेरा है लेकिन यहाँ लोगों की संख्या अधिक होने के कारण ठंड से बचने के लिए कई लोगों को अपने शरीर पर किराये का लिहाफ ओढ़ना पड़ता है. चाय और नास्ते भी तब बाटें जातें है जब अधिकांश लोग वहाँ से चले जाते हैं. नियम के मुताबिक डॉक्टर को रैन बसेरों तक आना चाहिए, लेकिन अधिकतर रैन बसेरों में डॉक्टर साहब बस दूर से रजिस्टर में एंट्री करते हैं और उनका काम पूरा हो जाता है. 

दिल्ली सरकार के मुताबिक फिलहाल 221 रैन बसेरे चल रहे हैं, लेकिन हकीकत में जहां लोग अपनी रैन ना बसर कर पाएं, वह रैन बसेरे बस नाम ही के ही तो हैं.