Tuesday, 30 December 2014

ग्रामीण पर्यटन से सवारता गाँव



शहरों की भाग-दौड़ वाली ज़िंदगी से उबकर लोग सुख-शांति की तलाश में गाँव की तरफ रुख करने लगे हैं. यह रुख सदैव वहां रहने के लिए नहीं बल्कि पर्यटन के लिए हैं. गाँव में सुबह की ठंडी हवा, तालाब के किनारे बैठ कर बनमुर्गियों का तैरना देखना, हरे-भरे खेतों के बीच फोटो खिचवाने का क्रेज बढ़ने लगा है. गाँव की शांति और एकांत जहाँ लोगों को मानसिक शांति देता है वहीँ मंदिरों, देवालयों उनमें अध्यात्मिक वृद्धि भी करते हैं. ऐसा नहीं है कि ग्रामीण पर्यटन को सिर्फ विदेसी पर्यटक ही तवज्जों दे रहे हैं बल्कि इसे ऐसे लोगों द्वारा ज्यादा तवज्जो दी जा रही है जो पहले गाँव से थे परन्तु अब नौकरी या कारोबार के चलते उन्होंने शहर को ही अपना जीवन बना लिया है. ऐसे लोग अपने बच्चों को अपनी संस्कृति और अपने लोगों के गाँव की ज़िंदगी को रूबरू करवाने के लिए ग्रामीण पर्यटन करते हैं. पर्यटन के दौरान वे अपने बच्चों को यह बताना नहीं भूलते की वे कैसे खुद गाँव में काम करते थे. कैसे उनकी माँ भैंस का दूध निकाल कर उन्हें पीने को देती थी. कैसे वे पेड़ से फल तोड़ लेते थे, तालाब में दुबकी लगाकर सिंघाड़े निकाल लिया करते थे आदि.



अबकी बार जब मैंने बच्चों से कहा की हम घूमने चल रहे हैं तो बच्चे बड़े खुश हुए और अपनी तैयारी में लग गए. बच्चे बार-बार यही पूछ रहे थे कि डैड हम गोवा चल रहे हैं या शिमला या किसी हिल स्टेशन. लेकिन मैंने इस बार कुछ और ही सोच रखा था और बच्चों को ग्रामीण पर्यटन पर ले जाना चाहता था. जब बच्चों ने यह जाना तो उन्हें काफी निराशा हुई. परन्तु जब वे गाँव पर्यटन से लौटे तो उनके चहरे ख़ुशी से खिले हुए थे. क्योंकि यह उनके लिए एकदम नया अनुभव था इसके पहले उन्होंने खेत, बैलगाड़ी, ट्रेक्टर ढेर सारे गाय-भैंस फिल्मों में ही देखे थे परन्तु यहाँ वे उससे रूबरू हो सके और उसे करीब से जान सके.   


हमारे साथ कई विदेसी पर्यटक भी थे जो सुबह छाए कोहरे (fog) को देखकर चौंक गएँ और बाहर  निकलकर ठंडी-ठंडी हरी-हरी घांस में नंगे पैर चलने लगे. घांस पर पैर रखते ही ऐसा लगा जैसे बर्फ पर पैर रख दिया हो. सारे शरीर में एक ठंडी सी सुरसुरी सी दौड़ गयी. इसके बाद सबने बरामदे में जलाये गए अलाव का मजा लिया और नीम की दातौन से दांत साफ़ कियें. जब कोहरा थोड़ा छट गया तो सब हरे-भरे खेत में देखकर काफी खुश हुए और कुछ विदेशी पर्यटक खेत में जाकर खेत में काम करने वाले लोगों से मिले और उनके साथ अपनी तस्वीरें लीं. उनसे अनाज उगाने के बारे में जाना. बच्चों ने बाग़ से संतरे, अनार, आंवला तोड़े माली ने उन्हें  अनार और शरीफा भी दिए. जिसे खाकर वे काफी खुश हुए.


जब हम गाँव पहुचे तो वहाँ पर भैंसों से दूध निकला जा रहा था. पर्यटकों ने भी भैंस से दूध निकलना सीखा और कच्चा दूध पिया. बच्चे तो गाय, भैंस और कुत्ते के बच्चे (Puppy) के साथ खेलने में ही व्यस्त हो गए उन्हें इस दौरान अपना भी होश  नहीं रहा की उनके कपडे गंदे हो रहे हैं. स्त्रियां दूध निकालने, आटे की चक्की चलाने, मट्ठा निकालने की आजमाइश करने लगीं.
पर्यटकों के आग्रह पर सबके रहने की व्यवस्था गाँव के कच्चे घरों में की गयी. वहाँ सबने ताजा गुड, भुने शकरकंदी और आलू खाएं. चटनी के साथ आलू के परांठे और गुड की चाय उन्हें सबसे अच्छी लगी. रात में महिलाओं ने हाथों में मेहंदी और पेरों में महावर भी लगवाई और साथ में साड़ी भी पहनी. 


वहाँ सबने मिट्टी के अन्नागार, बाँस और मूज की टोकरी, खांची, मौनी, दौरी आदि देखे. पटसन, नारियल से बिनी खटिया पर बैठे. चूल्हे पर पका खाना एवं ताजा मट्ठा, मक्खन और दही भी खाया.  
बच्चों ने पेड़ से बंधे झूले झूले, भैंस, बैलगाड़ी, ट्रेक्टर की सवारी की उसके बाद सबने हाथी और ऊंट की भी सवारी की. लोगों ने नीलगाय भी देखी और खेत से गन्ने तोड़कर उसका रस चूसा. उसके बाद हम वहाँ के एक तालाब किनारे स्थित पुराने मंदिर गएँ जहाँ स्त्रियां देवी गीत गा रहीं थी और माता के दर्शन कर रही थी भी गए. वहाँ सभी घरों पर चित्रकारी की गयी थी और दरवाजे के सामने रंगोलियाँ बनाई गयी थी.
दोपहर को सब पक्के तालाब पर गए जो बहुत बड़ा स्विमिंग पूल सा था और उसमें मछलियाँ भी पाली गयी थी और बत्तख उसमे तैर रही थी. बच्चों ने उसमें नहाया और तैरना भी सिखा. मछलियाँ उनके अगल-बगल से निकल  रहीं थी और पानी से ऊपर उछल रही थीं. तालाब के किनारे मुर्गीपालन भी किया गया था और पर्यटकों को रिझाने के लिए खरगोश भी पाले गए थे.  

शाम को सबने पंचायत में भी हिस्सा लिया और रात में स्थानीय नृत्य और संगीत आयोजित हुआ जिसे मेरे परिवार को शहर में पहले कभी देखने का मौका नहीं मिला था. मैंने बच्चों को इससे पहले इतना खुश नहीं देखा था.


 दिलचस्प बात है कि महानगरों और ऐतिहासिक-धार्मिक-प्राकृतिक महत्व के स्थलों से जुड़ा पर्यटन अब  अपने आप आस-पास के ग्रामीण इलाकों और वहां के ग्रामीण जीवन को अपने अंदर समेटता जा रहा है. ग्रामीणों का खान-पानपहनावात्यौहार और मनोरंजन के उत्सव, मेले पर्यटक बाजार को काफी तेजी से अपनी तरफ खीच रहे हैं. सुदूर ग्रामीण इलाकों में बने किलेहवेलियां  जो देखरेख के अभाव में खंडहर होती जा रहीं थीवे अच्छी-खासी हेरिटेज होटल्स और रेस्तराओं में तब्दील होकर कमाई का नायाब जरिया बन गई हैं. पर्यटक भी सामान्य होटलों की तुलना में स्थानीय अतिथिगृहों में रहने के लिए अधिक भुगतान करने को तैयार रहते हैं.
ग्रामीण पर्यटन से सभी को ग्रामीण संस्कृति को जहाँ जानने का मौका मिलता है वही ग्रामीण लोगों की आमदनी में भी इजाफा होता हैं. सरकार और निजी क्षेत्र को ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने की जरूरत हैं जिससे लोगों को शहरी ऊब ख़त्म हो सके और उन्हें कुछ पल की शांति मिल सके और उनके बच्चे ग्रामीण संस्कृति के साथ कृषि से जुड़े लोगों की मेहनत को समझ सके. 

ऑस्ट्रेलिया से हमारे साथ घुमने गयीं 17 वर्षीय ओलिविया ने ग्रामीण पर्यटन का अनुभव कर बताया कि उसके  लिए गाय दुहना, मुर्ग़ियां और बत्तखों के साथ दौड़ना, बछड़े और खरगोश से प्यार करना उनकी ऑस्ट्रेलिया की  ज़िंदगी से बिल्कुल अलग था और उनके लिए यह एक नया अनुभव था.
ब्रिटेन से आई पर्यटक ब्रयोनी  का कहना है कि भारत में अपनी छुट्टियों के दौरान वे मिट्टी की झोंपड़ी में रहीं, पेड़ों से फल तोड़े, खेतों में भूसे के ढेर पर कूदीं, यहाँ तक कि गाँव की पंचायत में भी भाग लिया, वो सब उनके लिए एक अनोखा अनुभव था.

पर्यटन के दौरान सुविधा उपलब्ध करा रही एक महिला अलका तिवारी ने बताया की वहाँ पर्यटक सदियों पुरानी गाँव की ज़िंदगी का मज़ा उठा सकते हैं. उनका मानना है कि ज़्यादातर पर्यटकों के लिए, उनकी ये छुट्टियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें वे कभी भुला नहीं पाते और अपने यहाँ लौट कर और लोगों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करते हैं.



भारत सरकार का पर्यटन मंत्रालय अपनी 'अतुलनीय भारत' अभियान के अंतर्गत हर वर्ष अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में प्रिंट, इलेक्‍ट्रोनिक, ऑनलाइन और आउटडोर मीडिया अभियान के अंतर्गत प्रचार सामग्री जारी करता है उसमें ग्रामीण पर्यटन को भी शामिल किया जाय. अप्रवासी भारतियों को इस पर्यटन के लिए आसानी से आकर्षित किया जा सकता है. ग्रामीण पर्यटन को मुख्य पर्यटन के साथ मिलाकर यदि पैकेज बनाये जाय तो लोग ग्रामीण पर्यटन के लिए ज्यादा प्रोत्साहित होंगे.



यह भी अब देखा जा रहा है कि विदेशी पर्यटक भी अब ‘‘विलेज सफारी’’ के जरिये गाँवों की तरफ रूख़ कर रहे हैं. ‘विलेज सफारी’  आपको न केवल भारत के बेहतरीन गाँवों में ले जाता है बल्कि आपके रहने की व्यवस्था भी उसी परिवेश में करता है जिससे आप खुद को उसी गाँव का एक हिस्सा महसूस करें. तो फिर चलिए इस बार असली भारत यानि गाँव में अपनी छुट्टिया बिता कर देश के उस हिस्से को महसूस कर लिया जाय जो सबसे खास है. पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, सिक्किम, मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात जैसे राज्यों ग्रामीण पर्यटन को काफी विकास मिला है अब इसे भारत के हर गाँव में ले जाना है.