Saturday, 21 March 2015

आपकी - उजली शर्त पर बनियान काली




भाई साहब! यह राजनीति है, यहाँ लोग अपने बाप की पगड़ी उछालने में नहीं हिचकते. यह जगह ही ऐसी है की लोग अपने आप बदल जाते हैं...आज आपका दोस्त दिख रहा नेता ही कल हो सकता है आपके खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने की कतार में खड़ा पहला नेता हो. लेकिन भई हम आदमी हैं वो भी राजनीति में ...किसी आश्रम में नहीं...तो बड़े-बड़े मगरमच्छों के सामने हम भी थोड़ा बहुत ही सही पर घड़ियाली आंशु तो बहायेंगे ही...छोटी-मोटी चाले चलेंगे ही...जिंदगी में गलतियाँ हमने भी की है....बचपन में परिवार की आँख बचाकर मिठाइयाँ, नमकीन हमने भी खाएं हैं...बिना घर को खबर किये फिल्म हमने भी देखी  है..मास्टर जी की खिंचाई और खुबसूरत लड़की पर जान हमने भी छिड़की है... लेकिन अब हर जगह उसका गुणगान गाते थोड़े ही फिरेंगे..लेकिन राजनीति में यह भी एक मुद्दा है...जिसे आपका दोस्त पर अब आत्मश्लाघी या विपक्ष नेता जानता है...फिर इसे ही मुद्दा क्यों न बनाए. आपने उसके साथ उन लोगों के साथ रोटियां खाई जिनके साथ मनाही थी...आपने उन लोगों के बिल भरे जिनकी आपको जरुरत थी. आप ने बाहर दिखने वाली उजले कपड़े पहने पर आप की बनियान तो काली थी...पर वह छुपी हुई थी..आपके लोग जानते थे और आज उन्होंने आपकी उजली शर्ट में जगह-जगह छेद करने शुरू किए जो आपकी काली बनियान दिखनी शुरू हुई...पर तब तक देर हो चूकी थी..आप गाड़ी को गियर में डाल चुके थे और लोग दूर जाते हुए आपको और आपकी झाकती काली बनियान को देख रहे थे.

जनता आज तक नहीं समझ सकी कि राजनीति एक शराब है और जो इस दावत में पहले-पहल आता है वहां तक तो वह ठीक हो सकता है पर एक बार इसे चख लेने के बाद नशे में होना लाज़िमी है...नशे में वह हवा में उड़ेगा ही. कुछ लोगों पर काजल की कोठरी में जाने के कारण दाग़ भी लगेंगे और कुछ के मुंह भी काले हो जायेंगे..फिलहाल अभी सभी आप नशे में और धरातल से ऊपर हवा में हैं...फलस्वरूप गाड़ी को तेज भगा रहे हैं पर उन्हें क्या पता की वह अपनी कब्र खुद खोद रहे हैं क्योंकि सड़क खडंजा है और विपक्षी सड़क पर कीले, शीशे जैसे नुकीली चीजे फेकने के लिए तैयार खड़े हैं और जनता पेट्रोल ख़त्म होने के इंतजार में.....




राजनीति के झरोखे बैठ  
अजय कुमार त्रिपाठी