Sunday, 19 July 2015

यूँ ही बैठे-बैठे

Think About India


सोचो!
सब को एक सी आँखे मिलती और एक से भाव होते तो कितना गजब हो जाता? दुनिया कितनी छोटी हो जाती, सौन्दर्य कितना सिमित हो जाता. मैं तो कहता हूँ भाव-विभाव-अनुभाव-संचारी भाव... सब सामान होते... तब कोई कीचड़ को सुन्दर नहीं बताता और न ही कोई कमल खिल पाता. न ही कोई न दिखने वाली हवा पर कविता लिखता और न ही कबूतर संदेशा ले जाते.. हर बेटा माँ-बाप को भाई-बहन को, अड़ोसी-पडोसी को एक ही नजर से देखता.... हर किसी के एक से सपने होते, एक सी पसंद होती. 'विविधता' उल्लू उड़ चूका होता. कॉलेज में सबको एक ही लड़की/लड़का पसंद आती/आता और लोग एक ही व्यवसाय पसंद करते. लोग अनेक होकर भी एक होते. एक सा खाना खाते, एक ही पार्टी जीतती...न टंट होता न घंट होता...न चिल्ल होता न पौ होती... एक ही चीज पाने के लिए लड़ाइयाँ लड़ी जाती और जो जीत जाता वह प्रधानमंत्री सरीखा कुछ बन जाता. लोग उसे देख-देख कर जलते और मौका पाते ही उसकी टंगड़ी पकड़ के खीच लेते और खुद खास बन जाते. एक ही सर्वश्रेष्ठ बन पाता और सब खड़े उसके ताकने को ताकते. न हिन्दू होता और न मुस्लिम, न सिख, ईसाई, जैन, बोद्ध....सिर्फ एक ही खास होता बाकि सब बकवास.....