Friday, 4 September 2015

‪#‎डरहीविजय‬

Think About India


तुम कविता कहो,
कहानी या उपन्यास 
तो तुम्हें हक़ है 
बाकी सब बे-रस हैं
नई पौध कमजोर 
कहाँ है उसमें इतना प्राण
की बूढी हड्डियों,पतझड़ों का 
कर सके सामना

पर यह मत भूलो
रामचंद्र शुक्ल 
काँप गए थे विराट-पुरुष 
आकंचन निराला के सम्मुख 
न कह कर मान्यता दी 
पर जुबान पर कौन?
निराला या शुक्ल?

हम तो हैं नई कोपल
बढ़ना है 
बढेंगे,पाषाण से जिजीविषा खिचेंगे 
मुरझाने का वक्त हमारा नहीं 
आपने अपने वक्त पर लिखा 
पर अब हम भी लिख रहे संग आपके 
जिसकी माधुर्यता दोनों के होने से है 
अकेला नस्तर नहीं लगा सकता इसमें कोई

अभी तो सिर्फ विचार द्वन्द का पताका पहराया है 
बहसे बाकी है 
लेकिन गम विपक्षी मजबूत नहीं
शंकालु, अधीर, सिंहासनामुखी, षड्यंत्रकारी है
जो सिर्फ एकतरफे फैसले सुनाता है....